नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा

नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

जब नमाज़ पढ़ने का इरादा करें तो पहले कपड़ों और बदन की पाकी हासिल कर लें यानि बावुज़ू हो जायें फिर पाक जगह क़िबले की तरफ़ रुख़ करके इस तरह खड़े हों कि दोनों पाँव के पंजो में चार उंगल का फ़ासला हो।

namaz-katarika-1

सिर को झुका दें, नज़र को सजदे की जगह पर जमा दें। बेहतर है शैतान को ख़ुद से दूर रखने के लिये “क़ुल आऊज़ु बिरब्बीन्नास” की पूरी सूरह पढ़ लें। दिल में नीयत करें कि नमाज़ सिर्फ़ अल्लाह के वास्ते पढ़ रहे हैं और यह कि किस वक़्त की कौन सी नमाज़ पढ़ रहे हैं। ज़ुबान से भी नीयत के अल्फ़ाज़ कह लें तो बेहतर है। और इस तरह नमाज़ पढ़ें।

  • पहले नीयत बांधें – दोनों हाथ कान तक ले जायें कि अंगूठे कान की लौ से छू जायें और उंगलियाँ न मिली हुई हों और न ज़्यादा खुली हुई, हथेलियाँ क़िबले की तरफ़ हों।

    namaz-katarika-2

  • नीयत करके तकबीर-ए-तहरीमा, “अल्लाहु अकबर” कहते हुए हाथ नीचे लायें और नाफ़ के नीचे इस तरह बांध लें कि दाहिनी हथेली बायीं कलाई के सिरे पर हो और बीच की तीन उंगलियाँ बायीं कलाई की पीठ पर और अंगूठे और चुंगली से कलाई को पकड़ लें।

    namaz-katarika-3

    औरतों के लिये सुन्नत तरीक़ा यह है किः- हाथ कानों के बजाय सिर्फ़ कंधों तक उठायें और हाथ इस तरह बांधें कि पहले सीने पर छाती के नीचे बायाँ हाथ रखें उस पर दाहिने हाथ की हथेली रखें।

  • अब सना पढ़ें :-

    سُبۡحَٰنَکَ اللّٰھُمَّ وَ بِحَمۡدِ کَ وَ تَبَارَکَ اسۡمُکَ وَتَعَالٰی جَدُّ کَ وَ لَٓا اِلٰہَ غَیۡرُکَ

    (ऐ अल्लाह तू पाक है और मैं तेरी तारीफ़ के साथ तुझे याद करता हूँ
    तेरा नाम बरकत वाला है और तेरी शान बड़ी है और तेरे सिवा कोई माबूद नहीं।)

  • फिर तऊज़ पढ़ें –

    اَعُوۡذُ بِاللّٰہِ مِنَ الشَّیۡطٰنِ الرَّجِیۡمِ

    (मैं अल्लाह की पनाह लेता हूँ शैतान मरदूद से)

  • फिर तस्मिया कहें –

    ﴾﴿ بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

    (अल्लाह निहायत रहमत वाले बेहद रहम फ़रमाने वाले के नाम से।)

  • फिर अलहम्द शरीफ़ पढ़ें:- क़ुरआन पाक ऐसे पढ़ें कि हर हर्फ़ अपने सही मख़रज और सिफ़ात के साथ अदा हो, मद का भी ख़ास ख़्याल रखें ।  

﴾اَلۡحَمْدُ لِلّٰہِ رَبِّ الْعٰلَمِیۡنَۙ﴿۱﴾ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِۙ﴿۲﴾ مٰلِکِ یَوْمِ الدِّیۡنِؕ﴿۳

﴾اِیَّاکَ نَعْبُدُ وَ اِیَّاکَ نَسْتَعِیۡنُؕ﴿۴﴾ اِہۡدِ نَا الصِّرٰطَ الۡمُسۡتَقِیۡمَۙ﴿۵

صِرٰطَ الَّذِیۡنَ اَنۡعَمۡتَ عَلَیۡہِمۡ۬ۙ۬

﴾غَیۡرِ الۡمَغۡضُوۡبِ عَلَیۡہِمْ وَلَا الضَّآلِّیۡنَ٪﴿۷

(सब तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जो परवरिश फ़रमाने वाला है सब जहानों का, निहायत रहमत वाला, बेहद रहम फ़रमाने वाला, मालिक रोज़े जज़ा का । (ऐ अल्लाह हमें तौफ़ीक़ दे कि) हम तेरी ही बन्दगी करें और तुझी से मदद चाहें। (हमेशा) हमें सीधी राह चला,उन लोगों की राह जिन पर तूने इनाम फ़रमाया, न उनकी जिन पर (तेरा) ग़ज़ब हुआ और न गुमराहों की)

 

  • अलहम्द शरीफ़ ख़त्म पर “आमीन” आहिस्ता से कहें ।

  • सूरह मिलायें – कोई एक सूरह या कम से कम तीन छोटी आयतें या एक बड़ी आयत जो तीन के बराबर हो पढ़ें। जैसे सूरह इख़लासः-

﴾قُلْ ہُوَ اللّٰہُ اَحَدٌ ۚ﴿۱﴾ اَللّٰہُ الصَّمَدُ ۚ﴿۲

﴾لَمْ یَلِدْ ۬ۙ وَ لَمْ یُوۡلَدْ ۙ﴿۳

﴾وَ لَمْ یَکُنۡ لَّہٗ کُفُوًا اَحَدٌ ٪﴿۴

आप फ़रमा दीजिये वह अल्लाह है यकता (अकेला) है। अल्लाह बे-नियाज़ है (सब उसी के मोहताज हैं और वह किसी का मोहताज नहीं)। उसकी कोई औलाद नहीं और वह किसी की औलाद नहीं। और उसका कोई हमसर नहीं।

  • अब रुकू में जायें – “अल्लाहु अकबर” कहते हुए रुकू में जायें और घुटनों को हाथ से इस तरह पकड़ लें कि हथेलियाँ घुटने पर हों और उंगलियाँ ख़ूब फैली हों मिली हुई और एक तरफ़ को न हों। पीठ सीधी बिछी हुई हो और सिर उसकी सीध में रहे, ऊँचा नीचा न हो।

    namaz-katarika-4

    औरतें ज़्यादा न झुकें बस इतना कि हाथ घुटनों तक पहुँच जायें और उंगलियाँ भी मिली हुई रखें और टाँगे भी थोड़ी झुका लें। कम से कम तीन बार यह कहेः-

    سُبۡحَانَ رَبِّیَ الۡعَظِیۡمِ

    (पाक है मेरा अज़मत वाला रब)

  • फिर यह कहते हुए सीधे खड़े हो जायें – जमाअत में हों तो यह सिर्फ़ इमाम कहेगा मुक़तदी नहीं।

    سَمِعَ اللّٰہُ لِمَنۡ حَمِیۡدَہٗ

    (अल्लाह ने सुन ली जिसने उसकी तारीफ़ की)

    और इसके बाद यह कहें और कमर बिल्कुल सीधी कर लें –

    رَبَّنَا لَکَ الۡحَمۡدُ

    (ऐ हमारे रब! सब ख़ूबियाँ तेरे ही लिये हैं)

  • फिर सजदा करें –“अल्लाहु अकबर” कहते हुए सजदे में इस तरह जायें कि पहले घुटने ज़मीन पर रखें, फिर हाथ, फिर दोनों हाथों के बीच में सिर ऐसे रखें कि माथा और नाक की हड्डी ज़मीन पर अच्छी तरह लगी हुई हो और पहले नाक ज़मीन पर रखें, फिर माथा और जिस्म के हिस्से आपस में मिले न हों यानि बाज़ु करवटों से, पेट रानों से, राने पिंडलियों से और पिंडलियाँ ज़मीन से अलग हों। दोनों पाँव की सब उंगलियाँ क़िबले की तरफ़ हो और उनके पेट ज़मीन से जमे हों। हथेलियाँ बिछी हों और उंगलियाँ क़िबले की तरफ़ हों।

    सजदा इस तरह करें

    namaz-katarika-5

    औरतें अपने जिस्म को ज़्यादा से ज़्यादा समेट कर सजदा करें और बाज़ु करवटों से, पेट रानों से, राने पिंडलियों से और पिंडलियाँ ज़मीन से मिली हुई हों।

    कम से कम तीन बार यह कहेः-

    سُبۡحَانَ رَبِّیَ الۡاَعۡلٰی

    (पाक है मेरा रब सबसे बुलन्द)

  • फिर सजदे से उठें – पहले माथा उठायें, फिर नाक, फिर हाथ । दाहिना पैर ऐसे खड़ा करें कि उसकी उंगलियाँ ज़मीन पर जमी रहें और क़िबले रुख़ हों और बायाँ पैर बिछा कर उस पर सीधा बैठ जायें और हथेलियाँ फैला कर रानों पर घुटनों के पास रखें कि दोनों हाथों की उंगलियाँ भी क़िबले को हों।

    औरतें बैठने के लिये अपने दोनों पैर दाहिनी तरफ़ निकाल लें और बायें कूल्हे पर बैठ जायें।

  • फिर दूसरा सजदा करें – थोड़ा रुक कर “अल्लाहु अकबर” कहते हुए दूसरा सजदा करें।
  • अब दूसरी रकअत के लिये खड़े हों – खड़े होने के लिये इस तरतीब से उठें कि पहले माथा उठायें, फिर नाक, फिर हाथों को घुटनों पर रखकर खड़े हो जायें।
  • दूसरी रकअत – पहले की तरह “बिस्मिल्लाह” पढ़कर “अलहम्द शरीफ़” पढ़ें और कोई सूरह मिलायें, फिर उसी तरह रुकू और सजदा करके पहले बताये गये तरीक़े से बैठ जायें और क़ादा करें।क़ादा में ऐसे बैठें।

 

namaz-katarika-6

  • क़ादा में यह पढ़ें:-

    اَلتَّحِیَّاتُ لِلّٰہِ وَالصَّلَوٰتُ وَالطَّیِّبَاتُ  ط اَلسَّلَامُ عَلَیۡکَ اَیُّھَا النَّبِیُّ

    ﴾﴿وَ رَحۡمَۃُ اللّٰہِ وَ بَرَکَاتُہٗ  ط  اَلسَّلَامُ عَلَیۡنَا وَ عَلٰی عِبَادِ اللّٰہِ الصّٰلِحِیۡنَ

    ﴾﴿اَشۡھَدُ اَنۡ لَّا اِلٰھَ اِلَّااللّٰھُ وَاَشۡھَدُاَنَّ مُحَمَّدً عَبۡدُہٗ وَرَسُوۡلُھٗ

    सारी ज़बानी, बदनी और माली इबादतें अल्लाह के लिए हैं सलाम हो आप पर ऐ नबी और अल्लाह की रहमत और बरकतें, सलाम हो हम पर और अल्लाह के नेक बन्दों पर मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद گ उसके बन्दे और रसूल हैं

    जब “अशहदु अनलाइलाहा” के ‘ला’ पर पहुँचें तो दाहिने हाथ की बीच की उंगली और अंगूठे का हलक़ा बनायें और चुंगली और उसके पास वाली उंगली को हथेली से मिला दें और लफ़्ज़ ‘ला’ पर शहादत की उंगली उठायें और ‘इल्लल्लाह’ पर गिरा दें और सब उंगलियाँ फ़ौरन सीधी कर लें।

  • दो से ज़्यादा रकअतें पढ़नी हैं तो खड़े होकर और इसी तरह बाक़ी नमाज़ पढ़ें मगर फ़र्ज़ों की इन रकअतों में अलहम्द शरीफ़ के साथ सूरह नहीं मिलाई जायेगी।

  • क़ादा-ए- आख़ीरा जिस के बाद नमाज़ ख़त्म करेगें उसमें तशह्हुद (अत्तहीयात) के बाद दुरूद शरीफ़ पढ़ें।

 

اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلٰی مُحَمَدٍوَّعَلٰٓی اٰلِ مُحَمَدٍ کَمَا صَلَّیۡتَ عَلٰٓی اِبۡرٰھِیۡمَ

وَعَلٰٓی اٰلِ اِبۡرَھِیۡمَ اِنَّکَ حَمِیۡدٌ   مَّجِیۡدٌ   ط

اَللّٰھُمَّ بَارِکۡ عَلٰی مُحَمَدٍوَّعَلٰٓی اٰلِ مُحَمَدٍ کَمَا بَارَکۡتَ عَلٰٓی اِبۡرٰھِیۡمَ

وَعَلٰٓی اٰلِ اِبۡرٰھِیۡمَ اِنَّکَ حَمِیۡدٌ مَّجِیۡدٌ ط

ऐ अल्लाह! दुरूद भेज मुहम्मद पर और उनकी आल पर जिस तरह तूने दुरूद भेजा इब्राहीम पर और उनकी आल पर बेशक तू बहुत बुज़ुर्गी वाला है। ऐ अल्लाह! बरकत नाज़िल कर मुहम्मद पर और उनकी आल पर जिस तरह तूने बरकत नाज़िल की इब्राहीम पर और उनकी आल पर। बेशक तू बहुत बुज़ुर्गी वाला है।

  • दुआ पढ़ें – नीचे दी गई दुआओं में से कोई एक दुआ पढ़ें –

اَللّٰھُمَّ اِنِّیۡ ظَلَمۡتُ نَفۡسِیۡ ظُلۡمًا کَثِیۡرًاوَّلَا یَغۡفِرُالذُّنُوۡبَ اِلَّآ اَنۡتَ

﴾﴿فَاغۡفِرۡلِیۡ مَغۡفِرَۃُ مِّنۡ عِنۡدِکَ وَارۡحَمۡنِیۡ اِنَّکَ اَنۡتَ الۡغَفُوۡرُ الرَّحِیۡم

(ऐ अल्लाह! मैंने अपनी जान पर बहुत ज़ुल्म किया है और बेशक तेरे सिवा गुनाहों का बख़्शने वाला कोई नहीं है तू अपनी तरफ़ से मेरी मग़फ़िरत फ़रमा और मुझ पर रहम कर। बेशक तू ही बख़्शने वाला मेहरबान है।)

  • या यह दुआ पढ़ें

 

  • اَللّٰھُمَّ رَبَّنَا اٰتِنَا فِیۡ الدُّنۡیَا حَسَنَۃً وَّ فَیۡ الۡاٰخِرَۃِ حَسَنَۃً وَّقِنَا عَذَابَ النَّارِ

 

(ऐ अल्लाह! ऐ हमारे परवरदिगार! तू हमको दुनिया में नेकी दे और आख़िरत में नेकी दे

और हमको जहन्नम के अज़ाब से बचा।)

  • अब पहले दाहिने कंधे की तरफ़ मुँह करके “अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह” कहें और फिर बाईं तरफ़।

नोटः-

  1. नमाज़ का जो यह तरीक़ा बयान हुआ है इसमें कुछ बातें “फ़र्ज़” हैं, उनके बिना नमाज़ होगी ही नहीं।
  2. कुछ चीज़ें “वाजिब” हैं इनको जानबूझ कर छोड़ना सख़्त गुनाह है और तौबा करके नमाज़ दोबारा पढ़ना वाजिब है, भूल से छूटने पर सजदा-ए-सहव वाजिब होता है।
  3. कुछ बातें सुन्नत-ए-मौअक्कदा हैं, जिनको छोड़ने की आदत बना लेना गुनाह है।
  4. कुछ मुस्तहब हैं, जिनको करना सवाब है और छोड़ देने पर कोई गुनाह नहीं।
  5. यह तरीक़ा अकेले नमाज़ पढ़ने का है। जमाअत से नमाज़ पढ़ते में मुक़तदी के लिये क़ियाम में अलहम्द शरीफ़ और कोई सूरत पढ़ना जाइज़ नहीं और वह सिर्फ़ इमाम की क़िरात सुनें और अगर सुनाई न दे तब भी ख़ामोश खड़ा रहे।

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