हज़रत शीस अलैहिस्सलाम

हज़रत शीस अलैहिस्सलाम

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

हज़रत शीसے

तमाम क़ायनात सोगवार थी। पूरी फ़ज़ा ग़म में डूबी हुई थी। ज़मीन पर पहला क़त्ल हो चुका था। रुए ज़मीन पर ज़ुल्म का आग़ाज़ हो चुका था। हज़रत आदमے और हव्वाے बहुत ग़मग़ीन थे उनके आँसू नहीं थमते थे। एक बेटा बेदर्दी से क़त्ल कर दिया गया था और दूसरा मुर्दो जैसा हो गया था। तभी इस अँधेरे में नूर की एक किरण चमकी और तमाम कायनात को रौशन कर दिया। यह रौशनी थी अल्लाह के उस इनाम की जो अल्लाह ने अपने प्यारे बन्दे आदमے को एक बेटे के रूप में अता किया। दोनों इस इनाम को पाकर बहुत ख़ुश थे। आपने इनका नाम “शीस” रखा। हज़रत शीसے निहायत नेक ख़सलत, फ़रमाबरदार और अपने वालिद की तालीमात पर अमल करने वाले थे। 

जब आपकी उम्र 150 साल हुई तो आपकी शादी ह्ज़ूरता बिन्ते आदम से हुई। जिन से आपके यहाँ “अनूष और नाअमा” एक बेटा और बेटी पैदा हुए। इसके बाद आप 500   साल और ज़िंदा रहे और आपके यहाँ बहुत सी औलादें पैदा हुईं । 

वक़्त गुज़रता रहा औलादे आदम परवान चढ़ती रहीं। नई-नई बस्तियाँ और ज़िन्दगी गुज़ारने की नित नई चीज़ें ईजाद होने लगीं। औलादे आदम दो हिस्सों में तक़सीम हो गई जिसमे एक तरफ़ शीसے की औलाद थी और दूसरी तरफ़ क़ाबील की। 

हज़रत शीसے की औलाद  अहकाम-ए-ख़ुदावन्दी के मुताबिक़ ज़िन्दगी बसर कर रहे थे तो दूसरी तरफ क़ाबील की औलाद से तमाम बुराइयों की शुरुआत हो रही थी। शैतान अपनी कामयाबी का जश्न मना रहा था। नस्ले आदम का इम्तिहान शुरू हो चुका था। 

शीसے की औलाद पहाड़ो पर और क़ाबील की औलाद मैदानी इलाक़ों में आबाद हो गई। वक़्त अपनी मंज़िलें तय करता रहा। यहाँ तक कि हज़रत आदमے का अल्लाह की तरफ जाने का वक़्त आ पहुँचा। 

आदमے की वसीयत 

जब हज़रत आदमے की वफ़ात का वक़्त क़रीब आया तो आपने अपने बेटे शीसے को बुलाया और अपना वसीयत नामा लिखवाया साथ ही आपको बहुत सी बातें बताईं और अहद-व-पैमान लिए दिन-रात के औक़ात सिखाये।  फ़रमाया- “मेरे बेटे! सुनो हर घड़ी में अल्लाह की कोई न कोई मख़लूक़ इबादत करती है”। फिर  फ़रमाया- “ज़मीन पर  तूफ़ान  आयेगा जो सात  सौ साल ठहरेगा”।  वह किताब जिसमे वसीयत लिखवाई गई थी इसे क़ाबील की औलाद से छिपा कर रखने का हुक्म दिया क्योंकि आप जानते थे कि क़ाबील ने हाबील को हसद की वजह से क़त्ल किया था।  इसलिए शीसے और उनकी औलाद को जो अपने वालिद की तरफ से हुक्म मिला उसको क़ाबील और उसकी औलाद से ख़ुफ़िया रखा गया।  

हज़रत शीसے की नुबूवत

हज़रात शीसے अपने वालिद के जानशीन बने। अल्लाह तआला ने आपको नुबूवत से सरफ़राज़ किया। आप पर 50 सहीफ़े नाज़िल किये गये।  आप अपने वालिद के नक़्शे क़दम पर चले और अपनी औलाद को भी नसीहत करते रहते और अल्लाह के अहकाम की पाबन्दी का हुक्म देते रहते।  

आपने अपने वालिद पर नाज़िल होने वाले सहीफ़ों को भी जमा किया और इसमें जो अहकाम दिये गये थे उनपर पूरा पूरा अमल भी किया। आप कई साल खाना-ए-काबा में रहे और लगातार हज और  उमरे करते रहे। इसके अलावा आपने पत्थर और गारे से खाना-ए-काबा को तामीर भी किया। इस तरह आप अपने नुबूवत के फराइज़  अंजाम देते रहे।  आप अपनी औलाद को बनु क़ाबील यानि क़ाबील की औलाद की तरफ़ जाने से रोकते रहे और इस बारे में उन्हें बराबर नसीहत भी करते रहे। 

हज़रात शीसے की वफ़ात 

जब आपकी वफ़ात का वक़्त क़रीब आया तो आपने अपने बेटे अनूष को तमाम मामलात सुपुर्द किये  जानशीन बनाया  और इसके बाद  पर्दा फ़रमा गए।  आपको अपने वालिद के पास जबल-ए-अबी क़ैस ग़ार में दफ़न किया गया। उलमा-ए-किराम का कहना है कि तूफ़ान-ए-नूह के वक़्त नूहے ने दोनों के जिस्मे मुबारक को निकाल कर कश्ती में रख लिया था और फिर तूफ़ान ख़त्म होने के बाद बैतुल मुक़द्दस में दफ़न कर दिया था।

हज़रत शीसے के वारिस

अनूष अपने वालिद के बताये हुए रास्ते पर चले और उसमे कोई तब्दीली नहीं की। अनूष के यहाँ “क़यान” पैदा हुए उनकी पैदाइश के वक़्त अनूष की उम्र 90 साल थी।  इसके बाद अनूष 815 साल ज़िंदा रहे और अपनी औलाद को हक़ की  तलक़ीन करते रहे।  जब अनूष की वफ़ात का वक़्त क़रीब आया तो इन्होने सारे मामलात अपने बेटे क़यान को सौंपे और उनको अपना जानशीन बनाया।  इसी तरह क़यान के बेटे “महलाईल” इनके जानशीन बने।  क़यान की कुल उम्र 910 बरस हुई।  महलाईल के बेटे “यरद” के यहाँ “ख़नूख़ यानि “इदरीसے” पैदा हुए।  

हज़रत शीसے से यरद तक  पेश आने वाले वाक़ियात 

  • महलाईल के दौर में नई-नई बस्तियां बसाई गईं और नई-नई सनअतों (Industries) की शुरुआत हुई।  अजमी  लोगों का इन्ही के बारे में ख़्याल है कि यह सात विलायतों के बादशाह बने।
  • इन्होने इब्लीस के लश्कर पर सख़्ती की और उन्हें पहाड़ों की वादियों में मार भगाया। सरकश और काफ़िर जिन्नों को मौत के घाट उतार दिया।
  • महलाईल ही पहले शख़्स हैं जिन्होंने जंगलात कटवाकर शहरों और क़िलों की बुनियाद डाली और मस्जिदें बनवाईं। जो शहर बसाये उनमें “बाबुल” जो कूफ़ा के पास है और “सोस” ख़ास हैं।
  • सबसे पहले खान से लोहा निकालने की शुराआत भी आपके ज़माने में ही हुई और उनसे कई तरह के हथियार बनाये गये।
  • पानी को जमा करके बाँध बनाये गये जिससे लोगों को खेती बाड़ी में  दिलचस्पी पैदा हुई।
  • ख़तरनाक नुक़सान करने वाले जानवरों को मारकर उनकी खाल से लिबास और चटाईयाँ वगैरा बनाई गईं।

महलाईल लोगों के दरमियान इंसाफ़ से फ़ैसले करते थे। इनकी हुकूमत चालीस साल रही। महलाईल के बाद इनके जानशीन इनके बेटे “यरद” बने। यह अपने वालिद के तरीक़े पर रहे और उन नसीहतों के वारिस बने जो इनके दादा ने इनके वालिद को की थीं। और तमाम मामलात इसी तरह चलाये जिस तरह इनके वालिद ने चलाये थे। 

क़ाबील की औलाद का हाल

यह तो था हज़रत शीसے और उनकी औलादों का बयान अब मैदानी लोगों की तरफ चलते हैं जो क़ाबील की औलाद थे। क़ाबील के अज़ाब में कुछ ढील दी गई। और उसको मोहलत दी गई। वो मैदानी इलाक़ों की तरफ चला गया था । वहाँ उसके बहुत सी औलादें हुई।  इसके एक लड़का “ख़नूक़” पैदा हुआ और ख़नूक़ के यहाँ इसका बेटा “अन्दर” पैदा हुआ इस से “महावील” और महावील से मतुशील पैदा हुआ । क़ाबील की औलाद में एक शख्स तोबाल नामी था जिसने सारंगी, डफ़ और ढोल वग़ैरा  ईजाद किये। और “तोबिलतीन” नाम के एक आदमी ने लोहे और पीतल की कारीगरी शुरू की।

बनु क़ाबील की ख़ूबसूरत औरतें और बेहयाई की शुरुआत

पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले बनु शीस के मर्द हसीन थे और औरतें बदसूरत थीं जबकि दूसरी तरफ़ मैदानी इलाक़ों के मर्द बदसूरत औऱ औरतें ख़ूबसूरत थीं। एक दिन शैतान मैदानी इलाक़ों मे से किसी के पास नौकर हो गया और वहाँ रह कर उस आदमी की ख़िदमत करने लगा। इसी दौरान उसने बाँसुरी की शक्ल का एक आला बनाया जिससे बहुत सुरीली आवाज़ निकलती थी जो लोगों ने कभी नही सुनी थी। लोग इसे सुनकर मसरूर हो जाते थे कुछ ही वक़्त में यह ख़बर दूर दूर तक फ़ैल गई लोग इसकी आवाज़ सुनने आने लगे। फिर उन्होंने साल मे एक दिन मुक़र्रर कर लिया जिसमें सारे लोग जमा होते और इस शैतानी आले से अपने दिल को बहलाते औरते ख़ूब सज धज कर निकलतीं और सब को लुभाती थीं।

एक दिन किसी झगड़े की वजह से एक पहाड़ी शख़्स ने इन पर हमला कर दिया। वह इन औरतों की ख़ूबसूरती देखकर हैरान रह गया उसने जाकर अपने साथियों को बताया। लिहाज़ा कुछ पहाड़ी लोग मैदानी इलाक़े में रहने वाली औरतों की ख़ूबसूरती देखने चले और जाकर बदकारी मे पड़ गये । उन्होंने आपस मे शादियाँ भी शुरू कर दीं जिससे इनकी तादात बहुत बढ़ गई और बहुत से लोग सरकश और नाफ़रमान हो गये। यह लोग ही “तूफान-ए-नूह” मे हलाक किये गये।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने शैतान को क़यामत तक के लिये ढील दी ताकि नस्ले आदम का इम्तिहान हो जाये और शैतान बराबर इस कोशिश में लगा कि आदमी को बहका सके। और उसने बहुत सी औलादे आदम को बहका कर जहन्नुम के कभी न ख़त्म होने वाले अज़ाब की तरफ़ धकेल दिया। जो रब के नेक बंदे इसके शर से बचे रहे उन्होंने कामयाबी हासिल की और जन्नत की कभी ख़त्म न होने वाली नेअमतें उनके इन्तज़ार में हैं।

अल्लाह तआला हमें और हमारी आने वाली नस्लों को शैतान के शर से महफूज़ रखे आमीन!

नोटः- क़ाबील की औलाद के वाक़ियात का यह हिस्सा अहले किताब की रिवायतों से लिया गया है इसलिये इसमें ग़लती भी हो सकती है । वल्लाहु आलम

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