जिस्म की फ़ालतू चीज़ें से पाकी

जिस्म की फ़ालतू चीज़ें से पाकी

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

इसमें हम उन चीज़ों का ज़िक्र करेंगे जो नापाक तो नहीं होती मगर सही तरह से पाकी हासिल करने में रुकावट पैदा करती हैं। कभी-कभी तो इन चीज़ों की वजह से वुज़ू और ग़ुस्ल भी सही नहीं हो पाता जिससे इबादतें बर्बाद हो सकती हैं। लिहाज़ा इस पर ध्यान देना ज़रूरी है। यह तीन (3) तरह की होती हैं।

मैल:- 
सिर और दाढ़ी के बालों में जमा होने वाले मैल और जुओं का साफ़ करना मुस्ताहिब है। इनकी सफ़ाई के लिये बालों को धोने, तेल लगाने और कंघा करने का हुक्म है। हज़रत मुहम्मद ﷺ अपने बालों में कभी कभी तेल डालते और कंघा करते।
आपका फ़रमान है कि-

जिसके बाल हों उसे चाहिये कि उनका इकराम करे (यानि देखभाल करे)

(अबू दाऊद)

इसी तरह कानों, दाँतों और नाख़ूनों वग़ैरा में जो मैल जम जाता है उसे साफ़ करना भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि जमे हुए मैल से सिर्फ़ सही तरह से पाकी हासिल करने में ही रुकावट नहीं आती बल्कि तरह-तरह की बीमारियाँ होने का भी ख़तरा रहता है।

रतूबतें :-
हमारी नाक और आँखों से ऐसी रतूबतें निकलती हैं जो सूख कर नथनों में या आँखों के कोए में जम जाती हैं जिस की वजह से वुज़ू और ग़ुस्ल सही नहीं होते।

फ़ालतू चीज़े जैसे बढ़े हुए नाख़ून और बाल वग़ैरा :- 
बदन में बढ़ी हुई फ़ालतू चीज़ें जिन की वजह से नापाकी या जनाबत दूर नहीं हो पाती उनसे निजात हासिल करने के लिये यह काम ज़रूरी हैं।

(1) सिर के बाल कटवाना/कतरवाना।

(2) मूँछों के बाल कतरवाना।

(3) बग़लों के बाल साफ़ करना ।

(4) नाफ़ के नीचे के बाल साफ़ करना।

(5) नाख़ून काटना।

(6) ख़तना कराना।

(7) दाढ़ी के बाल एक मुट्ठी से ज़्यादा को कतरवाना।

सिर के बालों के बारे में शरई हुक्म यह है कि बाल रखना भी जाइज़ है और कटवाना भी। लेकिन बालों का कटवाना यानि मुँडवाना अफ़ज़ल है और अगर बाल रखे जाएं तो शरीफ़़ों वाले। कोई भी मर्द औरतों की तरह बाल न रखे और ऐसे ही न कोई औरत मर्दों की तरह बाल कटवाये।

सिर के बाल मुँडवाने की फ़ज़ीलत
हज़रत मीर अब्दुल वाहिद बिलगिरामी रहमतुल्लाह अलैह अपनी मशहूर किताब ‘सबआ सनाबिल’ में बालों को मुँडवाने (कटवाकर साफ़ कराने) की फ़जीलत बयान करते हुए लिखते हैं कि-
‘‘खु़लाफ़ाए राशिदीन और दूसरे तमाम सिहाबा सिर मुँडाते रहे हैं ऐसे ही तमाम अइम्मा। लिहाज़ा इमाम आज़म अबू हनीफ़ाؒ, इमाम शाफ़ईؒ, इमाम मालिकؒ और इमाम अहमद बिन हम्बल ؒ और तमाम तबक़ात के मशाइख़ के सिर मुँडे हुए थे तो उनकी सीरत की पैरवी करना ही बेहतर और अच्छा है। हदीस शरीफ़़ मे है कि सिर मुँडाने वाले शख़्स को मौत की कड़वाहट, क़ब्र का अज़ाब और क़यामत का डर नहीं होगा। ऐसे शख़्स को अंबिया -ए-किराम ےके साथ क़ब्र से उठाया जायेगा और रसूलों के पास जगह दी जायेगी और उसके सिर से जितने बाल जुदा होंगे तो हर बाल के बदले एक फ़रिश्ता पैदा किया जायेगा जो क़यामत तक उस शख़्स के लिये असतग़फ़ार करता रहेगा।

हज़रत अबू हुरैराؓसे रिवायत है कि नबी-ए-करीमگ ने फ़रमाया इलाही सिर मुँडाने वालों को बख़्श दे, सिहाबा ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह बाल कतरने वालों को भी, फिर आप گ ने फ़रमाया इलाही सिर मुँडाने वालों की बख़्शिश फ़रमा, सिहाबा ने फिर अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह बाल कतरने वालों को भी, आप گ ने फिर फ़रमाया इलाही सिर मुँडाने वालों की बख़्शिश फ़रमा, फिर अर्ज़ किया गया या रसूलुल्लाह बाल कतरने वालों को भी, आप گ ने फ़रमाया और बाल कतरने वालों की भी (मग़फि़रत फ़रमा दे)।

मौअल्लिफ़ (Author) के दिल में यह सवाल आता है कि वुज़ू मेें सिर का मसह फ़र्ज़ है हालांकि बालों में मसह करने से सही मसह हो जाता है लेकिन मसह की हक़ीक़त नहीं पाई जाती मगर सिर मुँडाने में।

इसी लिये हज़रत अली करमल्लाह वजहु से मरवी है कि आप रोज़ाना सिर मुँडाया करते थे’’

मूँछोे के बाल:-
मूँछोे के बालों के लिये हज़रत मुहम्मदگ का हुक्म है कि मूँछे कतरवाओ और दाढि़याँ बढ़ाओ और मूँछों को मूँडने का अहादीस में कोई ज़िक्र नहीं मिलता लेकिन मूँछों को कतरवाने में ज़्यादती करनी चाहिये, मूँछों के कतरवाने मे होंठों के ऊपर का हिस्सा लिया जाता है और मूँछों के दोनों तरफ़ के बाल बढ़ाने में कोई हर्ज नहीं।

बग़लों और नाफ़ के नीचे के बाल:-
बग़लों और नाफ़ के नीचे के बाल साफ़ करने के लिये बेहतर यह है कि हर आठवें दिन यानि जुम्मे को जब ग़ुस्ल करें तो इन बालों को भी उस्तरे (Razor) से साफ़ कर लें। औरतों के लिये बेहतर है कि किसी साबुन या क्रीम से यह बाल साफ़ करें। इन बालों को साफ़ करने की मुद्दत किसी भी हाल में चालीस (40) दिन ये ज़्यादा नहीं होनी चाहिये।
नाख़ून काटने के लिये भी यही बेहतर है कि हर आठवें दिन दोनों हाथों और पैरों की उँगलियों के नाख़ून काट लेने चाहियें ताकि इसमें मैल या कोई ऐसी चीज़ न फंस जाये जो वुज़ू या ग़ुस्ल करने मे रुकावट बने। मैल अगर वुज़ू/ग़ुस्ल के लिये रुकावट न भी हो लेकिन सेहत के लिये तो ख़तरनाक होता ही है, इसी वजह से आपگ नाख़ून काटने की बहुत ताकीद फ़रमाते आपگ का फ़रमाने आलीशान है।

‘‘ऐ अबू हुरैरा अपने नाख़ून तराशो, क्योंकि बढ़े हुऐ नाख़ूनो पर शैतान बैठता है’’

(जामा-ए-ख़तीब)

नाख़ून काटने को मसनून तरीक़ा
हाथों के नाख़ून काटने के लिये दाहिने हाथ की शहादत की उँगली (Index Finger) से शुरुआत करनी चाहिये और तरतीब से चुँगली तक सब उँगलियों के नाख़ून काटने चाहिये। फिर बाँये हाथ की चुँगली से शुरु करके तरतीब वार अँगूठे तक सब उँगलियों के नाख़ून काटें और सब से आखि़र में दाहिने हाथ के अँगूठे के नाख़ून काटने चाहिये।
पैर के नाख़ून काटने के लिये वही तरतीब होनी चाहिये जो वुज़ू में उँगलियों की घाइयाँ धोने में रखी जाती है यानि शुरुआत दाहिने पैर की चुँगली से करें और अँगूठे पर ख़त्म करें। बायें पैर में शुरुआत अँगूठे से करें और चुँगली पर ख़त्म करें।

ख़तना
ख़तना सुन्नत है और इस्लामी पहचान है इससे मुस्लिम व ग़ैरमुस्लिम में फर्क़ मालूम होता है इसलिए इसे मुसलमानी भी कहते हैं।
ख़तना का मतलब यह है कि मर्द के आला-ए-तनासुल (लिंग) पर आगे की तरफ़ जो फ़ालतू खाल होती है उसे काट दिया जाता है। हमारे हुज़ूरگ ख़तना किये हुए पैदा हुए। ख़तना बारह साल की उम्र तक कराई जा सकती है। यहूदी अपने बच्चों की पैदा होने के सातवें दिन ख़तना करा देते थे लिहाज़ा उनकी मुख़ालफ़त की वजह से थोड़ा इंतज़ार करना बेहतर है कि आगे के दाँत निकल आयें। बाज़ उलमा ने पैदाइश के सातवें दिन कराना भी जाइज़ बताया है। अगर बच्चा ख़तना हुए पैदा हुआ तो ख़तना की ज़रूरत नहीं। कोई बूढ़ा आदमी ईमान लाया और उसमें ख़तना कराने की ताक़त नहीं तो ख़तना की ज़रूरत नहीं।

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