चौथे और पाँचवे दिन की रमी

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

चौथे और पाँचवें दिन यानि ग्यारह (11) और बारह (12) तारीख़ की रमी

  • ग्यारह(11) तारीख़ ज़ुहर की नमाज़ के बाद इमाम का ख़ुतबा सुन कर फिर रमी को चलें।
  • अब रमी जमर-ए-ऊला से शुरू करें जो मस्जिदे ख़ैफ़ से क़रीब है।
  • यहाँ क़िब्ले की जानिब मुँह करके सात कंकरियाँ ज़िक्र किये गये तरीक़े के मुताबिक़ मार कर जमरा से कुछ आगे बढ़ जाएं।
  • क़िब्ले की तरफ़ मुँह करके दुआ में इस तरह हाथ उठाएं कि हथेलियाँ क़िबले की तरफ़ रहें।
  • दिल और ध्यान को बिल्कुल अल्लाह की तरफ़ लगाएं और हम्द, दुरूद, दुआ व इस्तग़फ़ार में कम से कम बीस आयतों के बराबर पढ़ने में मशग़ूल रहें हो सके तो पौन पारा या सूरह अलबक़रह की बराबर पढ़ने में मशग़ूल रहें।
  • फिर जमरा-ए-वुस्ता पर जाकर ऐसा ही करें।
  • फिर जमरतुलअक़ुबा पर जाकर रमी करें, मगर यहाँ रमी करके न ठहरें बल्कि फ़ौरन पलट आयें और पलटते में दुआ करें।
  • बिल्कुल इसी तरह बारह(12) तारीख़ ज़वाल के बाद तीनों जमरे की रमी करें
  • बाज़ लोग दोपहर से पहले रमी करके मक्का-ए-मौअज़्ज़मा को चल देते हैं यह हमारे अस्ल मज़हब के ख़िलाफ़ है और एक ज़ईफ़ रिवायत है तुम इस पर अमल न करो।
  • बारह(12) की रमी करके सूरज डूबने से पहले-पहले इख़्तियार है कि मक्का-ए-मौअज़्ज़मा को रवाना हो जाएं मगर सूरज छिपने के बाद जाना सही नही बल्कि बुरा है, अब एक दिन और ठहरना चाहिए और तेरह (13) को दोपहर ढलने यानि ज़वाल के बाद रमी करके मक्का-ए-मौअज़्ज़मा को जा सकते हैं और यही अफ़ज़ल है।
  • ज़्यादातर लोग बारह(12) को चले जाते हैं तो एक रात और दिन यहाँ और ठहरने में थोड़े लोगों को दिक़्क़त होगी लेकिन अगर तेरहवीं की सुबह यानि फ़ज्र की नमाज़ का वक़्त हो गया तो अब बग़ैर रमी किये जाना जाइज़ नहीं, अगर जायेगें तो दम वाजिब होगा।
  • ग्यारहवीं, बारहवीं का वक़्त सूरज ढलने यानि ज़ुहर का वक़्त शुरू होने से सुबह यानि तेरहवीं के सूरज की पहली किरन चमकने तक है मगर रात में यानि सूरज डूबने के बाद मकरूह है।
  • तेरहवीं की रमी का वक़्त हालांकि सुबह यानि फ़ज्र की नमाज़ का वक़्त शुरू होने से सूरज डूबने तक है मगर फ़ज्र के वक़्त से ज़वाल का वक़्त ख़त्म होने तक (यानि जब सूरज ढलना शुरू हो जाता है) मकरूह वक़्त है उसके बाद सूरज डूबने यानि ग़ुरूब-ए-आफ़ताब तक सुन्नत है।
  • पहली तीन तारीख़ों 10, 11, 12 की रमी दिन में नहीं की हो तो रात में कर लें यह अगर बग़ैर उज़्र है तो कराहत है वरना नहीं।
  • अगर रात में भी नहीं की तो क़ज़ा हो गई अब दूसरे दिन उसकी क़ज़ा दें और उसके ज़िम्मे कफ़्फ़ारा वाजिब और इस क़ज़ा का भी वक़्त तेरह के सूरज डूबने तक है अगर तेरह को सूरज डूब गया और रमी नहीं की तो अब रमी नहीं हो सकती और दम वाजिब हो गया।
  • अगर बिल्कुल रमी नहीं की जब भी एक ही दम वाजिब होगा।
  • कंकरियाँ चारों दिन के लिए ली थीं यानि सत्तर और बारह को रमी करके मक्का जाना चाहते हैं तो किसी और को अगर ज़रूरत हो तो उसे दे दें वरना किसी पाक जगह डाल दें। जमरों पर बची हुई कंकरियाँ फेंकना मकरूह है और दफ़न करने की भी ज़रूरत नहीं।
  • रमी पैदल भी जाइज़ है और सवार होकर भी मगर अफ़ज़ल यह है कि पहले और दूसरे जमरों पर पैदल रमी करें और तीसरे की सवारी पर।
  • अगर कंकरी किसी शख़्स की पीठ या किसी और चीज़ पर पड़ी और हिलगी रह गई तो उसके बदले की दूसरी मारें और अगर गिर पड़ी और वहाँ गिरी जहाँ उसकी जगह है यानि जमरा से तीन हाथ के फ़ासले के अन्दर तो जाइज़ हो गई।
  • अगर कंकरी किसी शख़्स पर पड़ी और उस पर से जमरा को लगी तो अगर मालूम हो कि उसके हटाने की वजह से जमरा पर पहुँची तो उसके बदले की दूसरी कंकरी मारें और मालूम न हो जब भी एहतियात यही है कि दूसरी मारें यूँ हीं अगर शक हो कि कंकरी अपनी जगह पर पहुँची या नहीं तो दोबारा मारें।
  • तरतीब के ख़िलाफ़ रमी की तो बेहतर यह है कि दोबारा मारें और अगर पहले जमरा की रमी नहीं की और दूसरे तीसरे की कर ली तो पहले पर मार कर फिर दूसरे और तीसरे पर मार लेना बेहतर है।
  • अगर तीन-तीन कंकरियाँ मारी हैं तो पहले पर चार और मारे और दूसरे तीसरे पर सात-सात और अगर चार-चार मारी हैं तो हर एक पर तीन-तीन और मारे। और बेहतर यह है कि दोबारा से रमी करें।
  • अगर इस तरह किया कि एक-एक कंकरी तीनों पर मारी फिर एक-एक इस तरह सात बार में सात-सात कंकरियाँ पूरी कीं तो पहले जमरा की रमी हो गई और दूसरे पर तीन और मारें और तीसरे पर छः तब रमी पूरी होगी।
  • जो शख़्स मरीज़ हो कि जमरा तक सवारी पर भी न जा सकता हो वह दूसरे को हुक्म कर दे कि इसकी तरफ़ से रमी करे।
  • दूसरे की तरफ़ से रमी करने वाले को चाहिए कि पहले अपनी तरफ़ से सात कंकरियाँ मारने के बाद मरीज़ की तरफ़ से रमी करे अगर इस तरह किया कि एक कंकरी अपनी तरफ़ से मारी फिर एक मरीज़ की तरफ़ से मारी इसी तरह सात बार किया तो मकरूह है।
  • मरीज़ के बग़ैर हुक्म रमी कर दी तो जाइज़ न हुई।
  • अगर मरीज़ में इतनी ताक़त नहीं कि रमी करे तो बेहतर यह है कि उसका साथी उसके हाथ पर कंकरी रख कर रमी कराये इसी तरह बेहोश या मजनून या ना-समझ की तरफ़ से उसके साथ वाले रमी कर दें और बेहतर यह कि उनके हाथ पर कंकरी रख कर रमी करायें।
  • गिन कर इक्कीस (21) कंकरियाँ ले गया और रमी करने के बाद देखता है कि चार बची हैं और यह याद नहीं कि कौन से जमरा पर कमी की तो पहले पर ये चार कंकरियाँ मारे और दोनों पिछलों पर सात-सात मारे और अगर तीन बची हैं तो हर एक पर एक-एक मारे और अगर एक या दो हों जब भी हर जमरा पर एक-एक मारे।
  • रमी से पहले हल्क़ यानि सर मुंडवाना जाइज़ नहीं।

ग्यारहवीं, बारहवीं की रमी दोपहर से पहले बिल्कुल सही नहीं।

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