वुक़ूफ़ के मसाइल

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

  • वुक़ूफ़ का वक़्त नौ (9) ज़िलहिज्जा के सूरज ढलने यानि ज़ुहर का वक़्त शुरू होने से दस (10) तारीख़ की सुबह़े सादिक़ यानि फ़ज्र की नमाज़ का वक़्त शुरू होने तक है, इस वक़्त के अलावा किसी और वक़्त वुक़ूफ़ किया तो हज नहीं हुआ।
  • थोड़ी देर ठहरने से भी वुक़ूफ़ हो जाता है चाहे उसे मालूम हो कि अराफ़ात है या मालूम न हो।
  • नापाकी की हालत में भी वुक़ूफ़ हो जाता है और इसके वुज़ू से होना या जनाबत, हैज़ व निफ़ास से पाक होना शर्त नहीं।
  • सोते हुए, जुनून व बेहोशी में, भी अराफ़ात से हो कर जो गुज़र गया तो उसके हज का यह ख़ास रुकुन अदा हो गया जबकि ये सब एहराम से हों।
  • बेहोशी में एहराम की सूरत यह है कि पहले होश में था और उसी वक़्त एहराम बाँध लिया था और अगर एहराम बाँधने से पहले बेहोश हो गया और उसके साथियों में से किसी ने या किसी और ने उसकी तरफ़ से एहराम बाँध दिया अगर्चे इस एहराम बाँधने वाले ने ख़ुद अपनी तरफ़ से भी एहराम बाँधा हो कि उसका एहराम इसके एहराम के मुनाफ़ी ख़िलाफ़ नहीं तो इस सूरत मे भी वह मुहरिम हो गया। दूसरे के एहराम बाँधने का यह मतलब नहीं कि उसके कपड़े उतार कर तहबन्द बाँध दे बल्कि यह कि उसकी तरफ़ से नीयत करे और लब्बैक कहे।
  • अक्सर लोग वुक़ूफ़ के लिए जबल-ए-रहमत के ऊपर चले जाते हैं। यह ग़लत है और सुन्नत के ख़िलाफ़ है।
  • जिसका हज फ़ौत हो गया यानि उसे वुक़ूफ़ न मिला तो अब हज के बाक़ी अफ़आल साक़ित यानि ख़त्म हो गये उसका एहराम उमरा की तरफ़ मुन्तक़िल हो गया लिहाज़ा उमरा करके एहराम खोल डाले और आइन्दा साल हज करे।
  • सूरज डूबने से पहले भीड़-भाड़ के ख़ौफ़ से अराफ़ात की हदों से बाहर हो गया उस पर दम वाजिब है फिर अगर आफ़ताब डूबने से पहले वापस आया और ठहरा रहा यहाँ तक कि आफ़ताब गुरूब हो गया तो दम माफ़ हो गया और अगर सूरज डूबने के बाद वापस आया तो दम माफ़ न हुआ।
  • मुहरिम (जो हालते एहराम में है) ने नमाज़े इशा नहीं पढ़ी है और वक़्त सिर्फ़ इतना बाक़ी है कि चार रकअत पढ़े मगर पढ़ता है तो वुक़ूफ़े अरफ़ा जाता रहेगा तो नमाज़ छोड़े और अराफ़ात को जाये। बेहतर यह कि चलते में पढ़ ले बाद को दोहराये।
  • एक ज़रूरी बात यह भी ध्यान में रखें कि एहराम बाँधनें के वक़्त से वुक़ूफ़े अरफ़ा के पहले तक अगर किसी ने जिमा (संभोग) कर लिया तो हज फ़ासिद हो जाएगा और उस पर तीन चीज़ें वाजिब हो जायेंगी-
    1. एक बकरी ज़िबह करे।
    2. इसी एहराम के साथ बाक़ी हज के अफ़आल करता रहे और जो बातें एहराम के दौरान मना हैं उनसे बचता रहे।
    3. अगले साल नए एहराम के साथ हज की क़ज़ा पूरी करे चाहे हज नफ़्ली ही क्यों न हो।

अराफ़ात में न तो मग़रिब की नमाज़ पढ़ें और न ही रात को वहा ठहरें बल्कि सूरज डूबते ही मुज़दलफ़ा को रवाना हो जाएं।

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