रमी के मसाइल

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

  • सात से कम कंकरियाँ जाइज़ नहीं अगर सिर्फ़ तीन मारीं या कोई नहीं मारी तो दम लाज़िम होगा और अगर चार मारीं तो बाक़ी हर कंकरी के बदले सदक़ा दे।
  • कंकरी मारने में पै दर पै होना शर्त नहीं मगर बीच में रुकना सुन्नत के ख़िलाफ़ है।
  • सब कंकरियाँ एक साथ फेंकी तो यह सातों एक ही मानी जायेंगी।
  • कंकरियाँ ज़मीन की जिन्स (क़िस्म) से होनी चाहियें यानि ऐसी चीज़ की जिस से तयम्मुम जाइज़ है जैसे कंकर, पत्थर, मिट्टी यहाँ तक कि अगर ख़ाक फेंकी जब भी रमी हो गई मगर एक कंकरी फेंकने के बराबर मानी जायेगी।
  • मोती, अम्बर, मुश्क वग़ैरा से रमी जाइज़ नहीं इसी तरह से जवाहरात और सोने चाँदी से भी रमी नहीं हो सकती।
  • बकरी वग़ैरा की मिंगनी से भी रमी जाइज़ नहीं।
  • जमरा के पास से कंकरियाँ उठाना मकरूह है क्योंकि कि वहाँ वो ही कंकरियाँ रहती हैं जो मक़ुबूल नहीं होतीं और मरदूद हो जाती हैं और जो मक़ुबूल हो जाती हैं उठा ली जाती हैं।
  • अगर मालूम हो कि कंकरियाँ नापाक हैं तो उनसे रमी करना मकरूह है और अगर मालूम नहीं तो मकरूह नहीं मगर धो लेना मुस्तहब है।
  • जमरा-ए-अक़बा की रमी का वक़्त दस (10) ज़िलहिज्जा को फ़ज्र का वक़्त शुरू होने से लेकर ग्यारह (11) ज़िलहिज्जा की फ़ज्र तक है मगर सुन्नत यह है कि सूरज निकलने के वक़्त से ज़वाल तक हो और ज़वाल से ग़ुरूब तक मुबाह और ग़ुरूब से फ़ज्र तक मकरूह, इसी तरह दस को फ़ज्र का वक़्त शुरू होने से सूरज के निकलने के वक़्त तक मकरूह है।
  • अगर कोई कमज़ोर और बीमार लोग औरते हों या मर्द दिन में कंकरियाँ न मार सकें तो रात को मारें।
  • जो लोग रात को कंकरियाँ मारें तो उनकी तरफ़ से क़ुरबानी अगले दिन होगी और फिर बाल मुंडवाने या कतरवाने के बाद एहराम खोला जायेगा।
  • अगर किसी ने रमी से पहले क़ुरबानी की तो दम लाज़िम होगा और अगर हल्क़ भी कर लिया तो दो दम देने पड़ेंगे।

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