हज की क़ुरबानी

हज की क़ुरबानी

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

  • जमरा-ए-अक़बा की रमी से फ़ारिग़ हो कर क़ुरबानी करें।
  • यह क़ुरबानी हज का शुक्राना है।
  • हज-ए-क़िरान और हज-ए-तमत्तो करने वालों पर यह क़ुरबानी वाजिब है और हज-ए-इफ़राद करने वालों के लिए मुस्तहब।
  • इस क़ुरबानी के लिए भी जानवर की उम्र वग़ैरा की वो ही शर्तें हैं जो ईद की क़ुरबानी के जानवर के लिए हैं।आजकल क़ुरबानी के लिए हालांकि बैंक में पैसे जमा किए जाते हैं लेकिन बेहतर यह है कि क़ुरबानी अपने सामने या फिर अपने किसी साथी के ज़रिए कराई जाए और जब क़ुरबानी हो जाए तब ही हल्क़ कराएं और एहराम खोलें वरना दम लाज़िम आएगा।
  • यह क़ुरबानी करके अपने और तमाम मुसलमानों के हज व क़ुरबानी क़ुबूल होने की दुआ माँगें।
  • आमतौर पर हाजियों पर ईदुल अज़हा की क़ुरबानी मुसाफ़िर होने की वजह से वाजिब नहीं लेकिन अगर कोई हाजी मिना में आठ (8) ज़िलहिज्जा से पहले, पंद्रह (15) या ज़्यादा दिनों से रह रहा है तो मुक़ीम कहलायेगा और उस पर ईदुल अज़हा की क़ुरबानी भी वाजिब आयेगी लिहाज़ा वो दो क़ुरबानियाँ करें।
  • ईदुल अज़हा की क़ुरबानी का इंतज़ाम अगर अपने वतन में करें तब भी कोई हर्ज नहीं।

अगर कोई शख़्स जो हज-ए-क़िरान या हज-ए-तमत्तो कर रहा हो और मोहताजे महज़ हो यानि न तो उसके पास क़ुरबानी के लायक़ कोई जानवर हो और न इतना पैसा या सामान हो कि उसे बेच कर क़ुरबानी करा सके तो उस पर क़ुरबानी के बदले दस रोज़े वाजिब होंगे, तीन तो हज के महीनों में यानि पहली शव्वाल से नवीं ज़िलहिज्जा तक एहराम बाँधने के बाद, इस बीच में जब चाहे रख ले एक साथ चाहे अलग-अलग और बेहतर यह है कि सात, आठ, नौ को रखे और बाक़ी सात तेरहवीं ज़िलहिज्जा के बाद जब चाहे रखे और बेहतर यह है कि यह सात रोज़े घर पहुँच कर हों।

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