वुक़ूफ़-ए-मुज़दलफ़ा

वुक़ूफ़-ए-मुज़दलफ़ा

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

वुक़ूफ़-ए-मुज़दलफ़ा (मुज़दलफ़ा का ठहरना)

  • यह हज के वाजिबात में है और इसका सही वक़्त फ़ज्र का वक़्त शुरू होने से ले कर सूरज निकलने तक है।
  • यह दरबारे आज़म की दूसरी हाज़िरी का वक़्त है यहाँ भी करम के दरवाज़े खोले गये हैं, कल अराफ़ात में हुक़ूक़ुल्लाह माफ़ हुए थे और यहाँ हुक़ूक़ुल इबाद माफ़ फ़रमाने का वादा है लिहाज़ा दुआओं में कोई कसर न छोड़ें।
  • मुमकिन हो तो मशअरुलहराम में यानि ख़ास पहाड़ी पर और जगह न मिले तो उसके दामन में वुक़ूफ़ करें और यहाँ भी जगह न मिले तो वादी-ए-मुहस्सर के अलावा जहाँ जगह मिले वुक़ूफ़ करें, वादी-ए-मुहस्सर में वुक़ूफ़ जाइज़ नहीं है क्योंकि यह वह जगह है जहाँ पर असहाबे फ़ील पर अज़ाब नाज़िल हुआ था और वो सब बातें जो वुक़ूफ़-ए-अराफ़ात में ज़िक्र हुईं उनका लिहाज़ रखें यानि लब्बैक की कसरत करें और ज़िक्र व दुरूद व दुआ में मशग़ूल रहें।
  • वुक़ूफ़-ए-मुज़दलफ़ा का वक़्त फ़ज्र का वक़्त शुरू होने से उजाला होने तक है यानि सूरज निकलने से पहले तक है। लिहाज़ा इस वक़्त से पहले पहुँचना ज़रूरी है जो इस वक़्त के बाद मुज़दलफ़ा पहुँचेगा तो उसका वुक़ूफ़ अदा नहीं होगा और कफ़्फ़ारे की कुरबानी लाज़िम होगी और जो सुबह सादिक़ होने से पहले चला गया उस पर भी कफ़्फ़ारे की क़ुरबानी लाज़िम होगी।
  • अगर इस वक़्त में यहाँ से हो कर गुज़र गया तो वुक़ूफ़ हो गया।
  • फ़ज्र का वक़्त शुरू होने से पहले जो यहाँ से चला गया उस पर दम वाजिब है।
  • बीमार, औरत या कमज़ोर जो भीड़ में तकलीफ़ या परेशानी की वजह से पहले चला गया तो उस पर दम वाजिब नहीं।
  • जो फ़ज्र की नमाज़ से पहले मगर फ़ज्र का वक़्त शुरू होने के बाद यहाँ से चला गया या सूरज निकलने के बाद गया तो बुरा किया मगर उस पर दम वाजिब नहीं।

 

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 वुक़ूफ़-ए-मुज़दलफ़ा का मन्ज़र

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