रमज़ान और मामूलात-ए-नबवीﷺ

रमज़ान और मामूलात-ए-नबवीﷺ

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

रमज़ानुल मुबारक का महीना बहुत ही बरकतों और सआदतों वाला महीना है। हदीस शरीफ़ में है-

रमज़ान अल्लाह का महीना है।

नबी-ए-करीम گ रमज़ानुल मुबारक से बहुत ज़्यादा मुहब्बत फ़रमाते और उसको पाने की अक्सर दुआ किया करते। हुज़ूर नबी-ए-अकरम گ इस मुबारक महीने का ख़ुश आमदीद कह कर इस्तिक़बाल (यानि Welcome) करते।

जब रमज़ान का महीना आया तो हुज़ूरگ  ने सिहाबा-ए-किराम ک से पूछा कि तुम किसका इस्तिक़बाल कर रहे हो और तुम्हारा कौन इस्तिक़बाल कर रहा है? (यह अल्फ़ाज़ आपने तीन बार फ़रमाये)- इस पर हज़रत उमरؓ ने अर्ज़ किया – या रसूलुल्लाह क्या कोई “वही”  उतरने वाली है या किसी दुश्मन से जंग होने वाली है? हुज़ूरگ  ने फ़रमाया – नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। फिर आपگ  ने फ़रमाया – “तुम रमज़ान का इस्तिक़बाल कर रहे हो जिस की पहली रात में तमाम अहले क़िब्ला को माफ़ कर दिया जाता है”।

                               (अत्तरग़ीब व तरहीब)

हुज़ूर नबी-ए-अकरमگ इस मुबारक महीने का इस्तिक़बाल शाबान के महीने से ही फ़रमाते और आम महीनों के मुक़ाबले शाबान में ज़्यादा रोज़े रखते।

जब रमज़ान का महीना शुरू होता तो आपकी इबादत और रियाज़त के मामूलात में आम दिनों के मुक़ाबले काफ़ी इज़ाफ़ा हो जाता।

क्योंकि हमारी कामयाबी आपگ  के मामूलात पर अमल करने से ही है, लिहाज़ा हम रमज़ानुल मुबारक में हुज़ूरگ  के कुछ मामूलात बयान कर रहे हैं ताकि उन मामूलात पर अमल करके इस मुबारक महीने की बरकतों और सआदतों का पूरा – पूरा फ़ायदा उठा सकें।

  1. रमज़ानुल मुबारक का चाँद देखने पर ख़ास दुआ फ़रमानाः-

जब नबी-ए-अकरमگ इस मुबारक महीने का चाँद देखते तो फ़रमातेः-

“यह चाँद ख़ैर व बरकत का है, यह चाँद ख़ैर व बरकत का है, यह चाँद ख़ैर व बरकत का है, मैं उस ज़ात पर ईमान रखता हूँ जिसने तुझे पैदा फ़रमाया”।                                                                          (मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा)

  1. सहरी और मामूलात-ए-नबवीگ

हुज़ूरگ रोज़े की शुरूआत लाज़मी तौर पर सहरी से फ़रमाते थे। आपگ  ने उम्मत को हिदायत फ़रमाई कि सहरी ज़रूर खाया करो चाहे वह पानी का एक घूँट ही क्यों न हो।

सहरी के बारे हुज़ूरگ की कुछ अहादीसः-

आपگ  ने इरशाद फ़रमाया-

  • “सहरी खाया करो क्योंकि सहरी में बरकत है।”                               (सही बुख़ारी अनस बिन मालिकؓ से रिवायत)
  • “हमारे और अहले किताब के रोज़ो में सहरी खाने का फ़र्क़ है।”                                             (सही मुस्लिम)
  • “सहरी सरापा (यानि पूरी) बरकत है इसे तर्क न किया करो (यानि इसे छोड़ो मत)”   (मुसनद अहमद बिन हम्बल)
  • “सहरी खाने वाले पर अल्लाह की रहमतें होती हैं।”                                              (मुसनद अहमद बिन हम्बल)
  • “दिन को क़ैलूला (यानि दोपहर को आराम) कर के रात की नमाज़ के लिये मदद हासिल करो और सहरी खा कर दिन के रोज़े की क़ुव्वत (ताक़त) हासिल करो ।”                                              (सुनन इब्ने माजाह)

हाफ़िज़ इब्ने हजर असक़लानीؒ  फ़रमाते हैं कि सहरी खाने की बरकत कई तरह से हासिल होती है-

  • सुन्नत पर अमल।
  • यहूदियों और ईसाइयों की मुख़ालफ़त।
  • इबादत के लिये क़ुव्वत हासिल करना।
  • ज़्यादा से ज़्यादा अमल करने के लिये तैयार होना।
  • भूख की वजह से जो बद-अख़लाक़ी या ग़ुस्सा पैदा होता है उससे छुटकारा।
  • सहरी में कई हक़दारों और ज़रूरतमंदों को शामिल कर लेना जो उस वक़्त मिल जाते हैं।

लेकिन सहरी खाने का यह मक़सद हरगिज़ नहीं कि बहुत ज़्यादा खाया जाये क्योंकि रोज़े का मक़सद पेट और शर्मगाह की ख़्वाहिशात को तोड़ना और औसत दर्जे पर लाना है लेकिन आदमी अगर इतना खा जाये जिससे रोज़े के मक़सद पूरे न हों बल्कि ख़त्म ही हो जायें तो यह रोज़े की रुह के ख़िलाफ़ है।

  1. इफ़्तार और मामूलात-ए-नबवीگ 

इफ़्तारी में हुज़ूरگ अक्सर खजूरों से रोज़ा इफ़्तार फ़रमाया करते अगर वह नहीं होतीं  तो पानी से इफ़्तार फ़रमा लेते। हज़रत सुलेमान बिन आमिरؓ से रिवायत है कि आपگ  ने इरशाद फ़रमाया-

“जब तुम में से कोई रोज़ा इफ़्तार करे तो उसे चाहिये कि खजूर से करे क्योंकि उसमें बरकत है अगर  खजूर न हो तो पानी से क्योंकि पानी पाक होता है।”                                                              (तिर्मिज़ी)

इफ़्तारी में जल्दी करनाः-

सहरी करने में देरी और इफ़्तारी में जल्दी करना हुज़ूरگ का हमेशा मामूल रहा

आपگ  ने इरशाद फ़रमाया-

“मेरी उम्मत के लोग भलाई पर रहेंगे जब तक वो रोज़ा जल्द इफ़्तार करते रहेंगे”

(सही मुस्लिम हज़रत सहल बिन सादؓसे रिवायत)

“मुझे रोज़ा जल्दी इफ़्तार करने और सहरी में ताख़ीर (देरी करने) करने का हुक्म दिया गया है।

(अस्सुनानुलकुबरा हज़रत इब्ने अब्बासؓ से रिवायत)

हदीसे क़ुदसी है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है-

“मेरे बन्दों में मुझे प्यारे वो हैं जो इफ़्तार में जल्दी करें”

(तिर्मिज़ी)

  1. रातों का क़ियाम और मामूलात-ए-नबवी گ

नबी-ए-अकरमگ रमज़ानुल मुबारक की रातों में मुस्तक़िल तौर पर ख़ूब – ख़ूब क़ियाम फ़रमाते और रात का ज़्यादातर हिस्सा नमाज़े तरावीह, तस्बीह व तहलील और ज़िक्र-ए-इलाही में गुज़ारते। तरावीह की नमाज़ आपके इसी मामूल का हिस्सा है।

रात के क़ियाम लिये जो महबूब अमल आप के अमल से साबित है वह तरावीह की नमाज़ है, जिसमें कुरान-ए-पाक की तिलावत की जाती है। तरावीह की नमाज़ का सुन्नत-ए-मुअक्कदा होना नस-ए-हदीस से साबित है। तरावीह जमाअत के साथ अदा करना फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है और दूसरा यह कि मौजूदा बीस रकअत तरावीह खुलाफ़ा-ए-राशिदीन की सुन्नत भी है। रमज़ानुल मुबारक में क़ियाम को बहुत ज़्यादा अहमियत हासिल है। इससे अल्लाह तआला यह चाहता है कि बन्दा रमज़ानुल मुबारक में रातों का ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त उसके हुज़ूर इबादत और ज़िक्र व फ़िक्र में गुज़ारे और इस्तिग़फ़ार से (यानि अपने गुनाहों की माफ़ी माँग कर) उसकी रज़ा का सामान इकठ्ठा करे। रमज़ानुल मुबारक की रातों की हर घड़ी इतनी फ़ज़ीलत और क़द्र व मन्ज़िलत वाली है कि हमारे लिये इसका अंदाज़ा लगाना नामुमकिन है।

  1. ख़त्म-ए-क़ुरआन का मामूल

रमज़ान का क़ुरआन से गहरा तआल्लुक़ है। अल्लाह तआला फ़रमाता है-

रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतरा,

(सूरह अलबक़राह, आयत-185)

हुज़ूरگ का रमज़ान के दौरान एक बार ख़त्मे क़ुरआन का मामूल था और आप ने उम्मत को इसी की तालीम और हिदायत फ़रमाई। दीन-ए-इस्लाम सादा और इंसानी फ़ितरत के मुताबिक़ है इसी लिये आपگ की तालीमात में भी इसी फ़ितरी सादगी की झलक नज़र आती है। इसीलिये हर उम्मती की सहूलत को ध्यान में रखते हुए आपگ माहे रमज़ान में एक बार क़ुरआन पाक ख़त्म करने के मामूल पर हमेशा क़ायम रहे।

आप گ के एक सहाबी हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस का मामूल हर रोज़ एक क़ुरआन ख़त्म करने का था आप گ ने उन सहाबी को बुलाया और दस्तूर के मुताबिक़ उस महीने में एक क़ुरआन पाक ख़त्म  करने की हिदायत फ़रमाई। उन्होंने अर्ज़ किया कि हुज़ूरگ ! मुझे इससे ज़्यादा की इस्तताअत है (यानि इससे ज़्यादा पढ़ने के लायक़ हूँ) और मुझे हाफ़िज़-ए-क़ुरआन होने की वजह से ज़्यादा की इजाज़त दे दी जाये। आप گ ने ज़्यादा इसरार करने पर पहले बीस दिन, फिर दस दिन और आख़िर में हर सात दिन में एक क़ुरआन पाक ख़त्म करने की इजाज़त इन अल्फ़ाज़ में अता फ़रमा दी

“सात दिन में एक क़ुरआन पढ़ लिया करो”

                                                                                                     (मुसनद अहमद बिन हम्बल)

  1. हुज़ूरگ और जिब्राईलے का दौरा-ए-ख़त्म-ए-क़ुरआन का मामूल

सहीहैन की हदीस से हुज़ूरگ और जिब्राईलے का दौरा-ए-ख़त्म-ए-क़ुरआन के मामूल के बारे में पता चलता है। हर रमज़ानुल मुबारक में रात के वक़्त हज़रत जिब्राईलے क़ुरआन पाक का दौर करने के लिये आपگ के हुजरा-ए-मुबारक में तशरीफ़ लाते, जब जिब्राईलے कलाम-ए-पाक की तिलावत फ़रमाते तो हुज़ूरگ समाअत फ़रमाते और जब हुज़ूरگ कलाम-ए-पाक की तिलावत फ़रमाते तो जिब्राईलے समाअत फ़रमाते। यहाँ तक कि जिस साल आपگ ने पर्दा फ़रमाया उस साल रमज़ान में आपने दो बार जिब्राईलے के साथ क़ुरआने पाक का दौर फ़रमाया- सुब्हानल्लाह।

  1. तहज्जुद और मामूले नबवीگ

हुज़ूरگ तहज्जुद की नमाज़ में आठ (8) रकअत अदा फ़रमाते, जिसमें वित्र  शामिल करके कुल ग्यारह (11) रकअतें बन जातीं। यही मसनून तरीक़ा  हुज़ूरگ से मन्सूब है। आपگ ने इरशाद फ़रमाया-“तुम पर रात का क़ियाम (नमाज़े तहज्जुद) लाज़मी है क्योंकि तुमसे पहले सुआलेहीन  का यह अमल रहा है और यह नमाज़ तुम्हें तुम्हारे रब से क़रीब करने वाली और गुनाहों को मिटाने वाली और बुराइयों से रोकने वाली है।       (सुनन तिर्मिज़ी)

तहज्जुद की नमाज़ मुस्तक़िल तौर पर पढ़ने से बन्दा अपने रब की नज़र में वह मुक़ाम और मर्तबा हासिल कर लेता है कि उसे इज़्ज़त, विक़ार और वह शान हासिल हो जाती है जिसकी वजह से उसे दुनिया में किसी के आगे हाथ फैलाने की ज़रूरत नही रहती और उसकी गर्दन बारगाहे ख़ुदावन्दी के सिवा और किसी के दर पर नहीं झुकती। रात की तन्हाई में अपने रब से गिड़गिड़ा कर ख़ुशू व ख़ुज़ू के साथ मांगने से बन्दा दुनिया से बे नियाज़ हो जाता है और शैतान को ख़ातिर में नहीं लाता।

  1. रमज़ान की रातें और मामूल-ए-नबवीگ

रमज़ानुल मुबारक की रातों में हुज़ूरگ का मामूल यह था कि आपگ इशा की नमाज़ और तरावीह अदा करने के बाद सोने के लिये तशरीफ़ ले जाते फिर रात के किसी हिस्से में जाग कर वित्र को मिलाकर तहज्जुद की ग्यारह रकअतें अदा फ़रमाते। तहज्जुद की नमाज़ के लिये इशा की नमाज़ के बाद कुछ सोना शर्त और सुन्नत है, यही अमल अफ़ज़ल और मुस्तहिब है। असहाब-ए-किराम व सल्फ़ सुआलीहीन से भी यह अमल साबित है।

  1. रमज़ान में सदक़ा व ख़ैरात की कसरत 

हुज़ूर नबी-ए-अकरमگ की आदते मुबारका यह थी कि आपگ हर वक़्त सदक़ा व ख़ैरात ख़ूब किया करते। कोई सवाली आपके दर से ख़ाली नहीं जाता लेकिन रमज़ानुल मुबारक में यह सदक़ा व ख़ैरात बहुत बढ़ जाता। इस महीने में हुज़ूर नबी-ए-अकरमگ हवाओं से भी ज़्यादा  सख़ावत फ़रमाते।

  1. एतिकाफ़ और मामूल-ए-नबवीگ

हुज़ूर नबी-ए-अकरम گ हर साल रमज़ानुल मुबारक में दस दिन तक एतिकाफ़ फ़रमाया करते लेकिन जिस साल आपने  पर्दा फ़रमाया उस साल बीस दिन तक एतिकाफ़ में रहे।                                                                                                                                                              (सही बुख़ारी, हज़रत अबू हुरैराؓ से रिवायत)

एतिकाफ़ में इन्सान दुनियावी मामलात से अलग होकर अपने रब की रज़ा के लिये गोशा-ए-तन्हाई इख़्तियार करता है। औलिया-ए-किराम और सूफ़िया-ए-किराम भी हुज़ूरگ की इसी सुन्नत पर अमल करते हुए अपनी ज़िन्दगी में चिल्ला कशी के अमल को इख़्तियार करते हैं ताकि  इसके ज़रिये ख़ुदा को राज़ी कर सकें।

रमज़ानुल मुबारक में हमारा मामूल

हुज़ूर नबी-ए-अकरमگ के रमज़ानुल मुबारक के मामूलात पढ़ने के बाद हमारे लिये ज़रूरी है कि हम अपने मामुलात पर नज़र डालें और रमज़ानुल मुबारक के सही पैग़ाम को समझें। रमज़ानुल मुबारक की हर घड़ी रब्बे ज़ुलजलाल की बे-इन्तिहा रहमतों और बरकतों की ख़ुशख़बरी लेकर आती है लेकिन क्या हम उससे फ़ायदा उठा कर आख़िरत में निजात हासिल करने के लिये कुछ सामान इकठ्ठा कर पाते हैं?

हमें अपना यह मामूल बनाना चाहिये कि जब हम सहरी के लिये उठें तो सबसे पहले बा वुज़ू हो कर तहज्जुद की नमाज़ अदा करें और पूरे महीने इस पर क़ायम रहने की कोशिश करते रहें क्या पता यह एक महीने की आदत हमारी ज़िंदगी का मामूल बन जाये और हम अपने रब के तहज्जुद गुज़ार बन्दों में शामिल हो जायें जिनकी शान में हुज़ूरگ ने इरशाद फ़रमाया –

“मेरी उम्मत के बरगुज़ीदा लोग वह हैं जो क़ुरआन को (अपने सीनों में) उठाये हुए हैं और शब बेदारी करने वाले हैं”

(शोबुल ईमान)

अल्लाह तआला से दुआ है कि हम सबको रमज़ानुल मुबारक की ज़्यादा से ज़्यादा रहमतें और बरकतें हासिल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए – आमीन

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