रोज़े की हक़ीक़त

रोज़े की हक़ीक़त

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

आमतौर पर तो सुबह सादिक़ से सूरज डूबने के वक़्त तक खाने पीने और जिन्सी अमल (Sexual Act) से रुके रहने से रोज़ा अदा हो जाता है मगर सही मानी में रोज़ा जिस्म के हिस्सों को गुनाहों से बचा कर रखने से होता है । यह छः चीज़ों  से पूरा होता है।

1. नज़रों की हिफ़ाज़त

नज़र नीची रखना और जो बातें बुरी और मकरुह हैं उनकी तरफ़ से नज़र को बचाना और साथ ही उन चीज़ों को देखने से अपनी नज़र को बचाना जिनसे दिल बटता हो और अल्लाह तआला की याद से ग़ाफ़िल  होता हो।

हमारे प्यारे नबी گ ने फ़रमाया कि-

  • नज़र ज़हर का बुझा हुआ शैतान के तीरों में से एक तीर है । जो अल्लाह तआला के खौफ़ से उसे छोड़ देगा अल्लाह तआला उसे ऐसा इनाम इनायत फ़रमायेगा जिसकी मिठास वह अपने दिल में पाएगा।

(हाकिम में हुज़ैफ़ा ک से रिवायत)

2. ज़ुबान की हिफ़ाज़त

ज़बान को बेहूदा बातों, झूठ, चुग़लख़ोरी, ग़ीबत और बेहयाई की बातों से बचानाऔर ज़ुल्म,  झगड़े और दूसरों की बात काटने से बचना और ऐसे मौक़ों पर ख़ामोशी इख़्तियार कर लेना । सबसे बेहतर तो यह है कि ज़िक्र-ए-इलाही और तिलावते क़ुरआन में ज़बान  को लगाये रखना।

हदीस शरीफ़ में आप گ के फ़रमान हैं कि-

  • पाँच चीज़ें रोज़ा तोड़ती हैं झूठ, चुग़ली, ग़ीबत, बेहयाई।
  • रोज़ा ढाल है जब तुम में से कोई रोज़ा रखे तो बेहयाई की बातें न करे ,न झगड़ा करे अगर कोई उससे लड़ाई करे या गाली दे तो उससे कह दे कि मैं रोज़ादार हूँ ।

 (बुख़ारी, मुस्लिम में अबू हुरैरा ک से रिवायत)

ग़ीबत के बारे में हुज़ूर گ के ज़माना-ए-मुबारक की एक हिकायतः

हुज़ूर گ के ज़माना-ए-मुबारक में दो औरतों ने रोज़ा रखा और शाम होने तक वो  भूख और प्यास से इतनी बेहाल हुईं  कि मरने के क़रीब हो गईं ,  उन्होंने हुज़ूर گ की ख़िदमत में एक शख़्स को भेज कर इफ़्तार की इजाज़त चाही, आप گ ने उनके पास एक प्याला भेजा और इरशाद फ़रमाया कि उन दोनो को कहना कि जो कुछ तुमने खाया हो इस प्याले में क़ै (उल्टी) कर दो, जब दोनों ने क़ै की तो  प्याला ताज़ा ख़ून और ताज़ा गोश्त से भर गया लोगों ने यह देख कर ताज्जुब किया । हुज़ूर گ ने फ़रमाया कि उन दोनों ने अल्लाह की हलाल की हुई चीज़ों से रोज़ा रखा और अल्लाह की  हराम की हुई चीज़ों से इफ़्तार किया । एक दूसरी के पास बैठ गई ,उन दोनो ने लोगों की ग़ीबत शुरू की। यह गोश्त प्याले में वह ही है जो उन दोनो ने लोगों की ग़ीबत करके खाया।

3. बुरी बात सुनने से कानों को बचाना

बुरी बात सुनने से अपने कानों को बचाना इस बारे में यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि जिस बात का बोलना हराम है उनका सुनना भी हराम है ।

  • हुज़ूर گने फ़रमाया कि ग़ीबत करने वाला और सुनने वाला गुनाह में दोनो शरीक हैं।

(तिबरानी में इब्ने उमर ک से रिवायत)

4. सिर्फ़ हलाल रिज़्क़ का इस्तिमाल करना

इफ़्तार के वक़्त हलाल की कमाई से हासिल की हुई खाने की हलाल चीज़ों का ही इस्तेमाल करना।    साथ ही हाथ पाँव और दूसरे हिस्सों को बुरी बातों से रोकना। बेहतर यह है कि वो खाने की चीज़ें जिनमें  थोड़ा सा भी शक हो तो उन्हें इफ़्तार में इस्तेमाल न करना क्योंकि दिन भर तो हलाल खाने से भी रुका  रहे और इफ़्तार हराम चीज़ों से किया जाये तो ऐसे रोज़े का कोई फ़ायदा नहीं।

  • हुज़ूर گ ने फ़रमाया कि बहुत से रोज़ादार ऐसे हैं जिनके रोज़े का हासिल सिवाय भूख और प्यास के कुछ भी नहीं है।

(निसाई में इब्ने मसूद ک से रिवायत)

इस हदीस के बारे में आलिमों की अलग-अलग राय हैं-

  • कुछ का मानना है कि इससे मुराद वह शख़्स है जो हराम खाने से इफ़्तार करे।
  • कुछ कहते हैं कि इससे मुराद वह शख़्स है जो दिन भर तो हलाल रिज़्क़ से रुका रहे और इफ़्तार लोगों के गोश्त यानि ग़ीबत से करे।
  • कुछ का मानना यह है कि इससे मुराद वह शख़्स है जो अपने आज़ा को गुनाहों से न बचाये।

 

5. हलाल रिज़्क़ भी कम इस्तेमाल करना

इफ़्तार के वक़्त हलाल भी ज़्यादा न खाये कि पेट फूल जाये क्योंकि अल्लाह के नज़दीक कोई बरतन इतना बुरा नही जितना बुरा पेट है जिसे हलाल रिज़्क़ से भर दिया गया हो । अक्सर ऐसा होता है  कि रोज़े में बहुत सी क़िस्म के  खाने सहरी और इफ़्तारी के लिये बनाये जाते हैं और रमज़ान में इतना खा जाते हैं कि आम दिनों में कई महीनों में भी न खायें । ज़ाहिर है कि रोज़े का मक़सद पेट को ख़ाली रखना और नफ़्स की ख़्वाहिश को तोड़ना है। रोज़े से मुराद यह है  कि नफ़्स परहेज़गार हो जाये। जब दिन भर मेदे को ख़ाली रख कर शाम को ख़ूब पेट भर कर लज़ीज़ खाने खाये जायें तो नफ़्सानी ख़्वाहिशात और ताक़तवर हो जाती हैं जिससे रोज़े का मक़सद ख़त्म हो जाता है। रोज़े की अस्ल रुह यह है कि बुराईयाँ पैदा करने वाली चीज़ें कमज़ोर पड़ें और शैतान के वार बेकार हों और यह रुह तभी हासिल होती है जब ग़िज़ा में कमी की जाये ।  रोज़े में बेहतर तो यह है कि दिन को बहुत न सोयें ताकि भूख और प्यास का पता चले और कमज़ोरी महसूस हो । कम खाने से  रात को भी हल्का महसूस करेगा जिससे तहज्जुद और दूसरे वज़ाइफ़ अदा करने में भी आसानी होगी। इस तरह शैतान उसके आस-पास नही भटकेगा और मुमकिन है कि वह आसमान के फ़रिश्तों को देख ले । शब क़द्र इसी रात का नाम है जिसमें फ़रिश्ते ज़ाहिर होते हैं । जो शख़्स अपने दिल और सीने के दरमियान में ग़िज़ा की आड़ करेगा तो उसके और फ़रिश्तों के बीच पर्दा रहेगा और जो अपना मेदा ख़ाली रखेगा तो उसके लिये यह पर्दा दूर हो जायेगा । लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिये कि इसके लिये ख़ाली पेट काफ़ी नहीं बल्कि यह भी ज़रूरी है कि अपना दिल ग़ैर-अल्लाह से ख़ाली रखे यानि अल्लाह के सिवा किसी का ख़्याल दिल में न हो और यही अस्ल है।

6. इफ़्तार के बाद दिल में ख़ौफ़ और उम्मीद का होना

इफ़्तार के बाद दिल में ख़ौफ़ और उम्मीद के मिले जुले ख़यालात होने चाहिये क्योंकि किसी को मालूम नहीं कि उसका रोज़ा क़ुबूल हुआ या नहीं । ख़ौफ़ इस वजह से कि कहीं किसी ग़लती या कमी की वजह से उसका रोज़ा क़ुबूल न हुआ हो और जिसकी वजह से उसपर अल्लाह का ग़ज़ब नाज़िल हो । साथ ही यह उम्मीद भी रखनी चाहिये कि उसका रोज़ा क़ुबूल होगा और अल्लाह तआला उससे राज़ी हो जायेगा और अपने क़ुर्ब वाले बन्दों में शामिल करेगा ।

 

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