मोज़ों पर मसह का बयान

मोज़ों पर मसह का बयान

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

जो शख़्स मोज़ा पहने हुए हो उसे वुज़ू में पाँव धोने के बजाय मसह करना जाइज़ है लेकिन पाँव का धोना बेहतर है, इसका मतलब यह नहीं कि मसह के जाइज़ होने में कोई शक करे। मोज़ों पर मसह के जाइज़ होने के बारे में बहुत हदीसें हैं। मोज़ों पर मसह औरतों को भी जाइज़ है लेकिन जिस पर ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो वह मोज़ों पर मसह नहीं कर सकता।

मसह करने के लिये कुछ शर्ते हैं जो इस तरह हैं।

  1. मोज़े ऐसे हों कि टख़ने छिप जायें इससे ज़्यादा होने की ज़रूरत नहीं और अगर थोड़ा कम हों जब भी मसह सही है लेकिन एड़ी नहीं खुलनी चाहिये।
  2. मोज़ा पाँव से चिपटा हो ताकि उसको पहन कर आसानी से चल फिर सकें।
  3. मोज़ा चमड़े का होना चाहिये अगर सिर्फ़ तला चमड़े का हो और बाक़ी किसी और मोटी चीज़ का जैसे रैकसीन वग़ैरा तब भी सही है।

मोज़ों पर मसह के मसाइल

जो शख़्स मोज़ा पहने हुए हो उसे वुज़ू में पाँव धोने के बजाय मसह करना जाइज़ है लेकिन पाँव का धोना बेहतर है, इसका मतलब यह नहीं कि मसह के जाइज़ होने में कोई शक करे। मोज़ों पर मसह के जाइज़ होने के बारे में बहुत हदीसें हैं। मोज़ों पर मसह औरतों को भी जाइज़ है लेकिन जिस पर ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो वह मोज़ों पर मसह नहीं कर सकता।

मसह करने के लिये कुछ शर्ते हैं जो इस तरह हैं।

  • आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले सूती, ऊनी या नायलान के मोज़ो पर मसह जाइज़ नहीं, उनको उतार कर पाँव धोना फ़र्ज़ है।
  • मोज़ा वुज़ू कर के पहना हो अगर बे वुज़ू पहना तो मसह जाइज़ नहीं।
  • जिस पर ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो और उसके लिये तयम्मुम किया और वुज़ू करके मोज़ा पहना तो मसह कर सकता है मगर जब जनाबत का तयम्मुम जाता रहा तो अब मसह जाइज़ नहीं।
  • मोज़ों पर मसह करने की मुद्दत (Duration) मुक़ीम (रहने वाला) के लिये एक दिन और एक रात और मुसाफि़र के लिये तीन दिन और तीन रातें हैं।
  • मोज़ा पहनने के बाद पहली बार जो हदस (यानि वह अमल जिससे वुज़ू ज़रूरी हो जाता है) हुआ उस वक़्त से मुद्दत मानी जायेगी जैसे सुबह के वक़्त मोज़ा पहना और ज़ुहर के वक़्त पहली बार हदस हुआ तो मुक़ीम दूसरे दिन की ज़ुहर तक जब भी वुज़ू करे पाँव धोने के बजाये मोज़ों पर मसह कर सकता है और मुसाफि़र चौथे दिन की ज़ुहर तक।
  • अगर मोज़ा फटा हुआ या सिलाई खुली हुई हो तो वह पाँव की छोटी तीन उंगलियों के बराबर या उससे ज़्यादा फटा न हो वरना उस पर मसह जाइज़ नहीं।

मोज़ों पर मसह करने का तरीक़ा

  • हाथ पानी से तर कर लें। उंगलियों का तर होना ज़रूरी है हाथ धोने के बाद जो तरी बाक़ी रह गई उससे मसह जाइज़ है मगर सिर का मसह करने के बाद हाथ में जो तरी मौजूद है उस से मसह जाइज़ नहीं।
  • अब दाहिने हाथ की तीन उंगलियाँ दाहिने पाँव के ऊपरी हिस्से पर रखकर उंगलियों की तरफ़ से पिंडली की तरफ़ कम से कम तीन उंगलियों के बराबर फेरें मगर पिंडली तक फेरना सुन्नत है।
  • फिर बायें हाथ की तीन उंगलियाँ बायें पाँव के ऊपरी हिस्से पर रखकर उंगलियों की तरफ़ से पिंडली की तरफ़ कम से कम तीन उंगलियों के बराबर फेरें ।

मसह में दो फ़र्ज़ हैं

  1. हर मोज़े का मसह हाथ की छोटी तीन उंगलियों के बराबर होना।
  2. मसह मोज़े की पीठ यानि पाँव के ऊपरी हिस्से पर होना चाहिये।

मसह किन चीज़ों से टूटता है

  • जिन चीज़ों से वुज़ू टूटता है उनसे मसह भी जाता रहता है।
  • मुद्दत पूरी हो जाने से मसह जाता रहता है और इस सूरत में अगर वुज़ू है तो सिर्फ़ पाँव धो लेना काफ़ी है फिर से पूरा वुज़ू करने की ज़रूरत नहीं और अच्छा यह है कि पूरा वुज़ू कर ले।
  • मोज़े उतार देने से मसह टूट जाता है चाहे एक ही उतारा हो।
  • ऐसे ही अगर एक पाँव आधे से ज़्यादा मोज़े से बाहर हो जाये तो मसह जाता रहता है।
  • मोज़ा ढीला है कि चलने में मोज़े से एड़ी निकल जाती है तो मसह नहीं जाता। अगर उतारने की नीयत से बाहर की तो टूट जाता है।

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