सई के कुछ ज़रूरी मसाइल

सई के कुछ ज़रूरी मसाइल

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

  • अगर मरवा से सई शुरू की तो पहला फेरा जो मरवा से सफ़ा को हुआ गिना नहीं जायेगा जब वापस सफ़ा से मरवा को जायेंगे तो यह पहला फेरा होगा।
  • जो शख़्स एहराम से पहले बेहोश हो गया है और उसके साथियों ने उसकी तरफ़ से एहराम बाँधा है तो उसकी तरफ़ से साथी “नियाबतन” यानि उसकी तरफ़ से सई कर सकते हैं।
  • सई के लिए शर्त यह है कि पूरे तवाफ़ या तवाफ़ के अक्सर हिस्से मसलन चार-पाँच फेरों के बाद हो लिहाज़ा अगर तवाफ़ से पहले या तवाफ़ के तीन फेरे के बाद सई की तो नहीं हुई।
  • सई के पहले एहराम होना भी शर्त है चाहे हज का एहराम हो या उमरा का। एहराम से पहले सई नहीं हो सकती।
  • हज की सई अगर वुक़ूफ़-ए-अरफ़ा से पहले करें तो सई के वक़्त में भी एहराम होना शर्त है और वुक़ूफ़े अरफ़ा के बाद सई हो तो सुन्नत यह है कि एहराम खोल चुके हों।
  • उमरा की सई में एहराम वाजिब है यानि अगर तवाफ़ के बाद सिर मुंडा लिया फिर सई की तो सई हो गई मगर चूँकि वाजिब तर्क हुआ लिहाज़ा दम वाजिब है।
  • सई के लिए तहारत शर्त नहीं हैज़ वाली औरत और जुनुब यानि जिस पर नहाना फ़र्ज़ हो वह भी सई कर सकता है।
  • सई में पैदल चलना वाजिब है जबकि उज़्र न हो लिहाज़ा अगर सवारी या डोली वग़ैरा पर सई की या पाँव से न चला बल्कि घिसटता हुआ गया तो हालते उज़्र में माफ़ है और बग़ैर उज़्र ऐसा किया तो दम वाजिब है।
  • सई में सत्र-ए-औरत सुन्नत है यानि अगर्चे सत्र का छुपाना फ़र्ज़ है मगर इस हालत में फ़र्ज़ के अलावा सुन्नत भी है कि अगर सत्र खुला रहा तो उसकी वजह से कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं मगर एक गुनाह फ़र्ज़ के तर्क का हुआ दूसरा सुन्नत के तर्क का।
  • बाज़ औरतें निहायत बेबाकी से सई करती हैं कि उनकी कलाईयाँ और गला खुला रहता है यह आमतौर पर भी गुनाह है और यह भी ख़्याल रहे कि मक्का-ए-मौअज़्ज़मा में गुनाह करना तो बहुत ही सख़्त बात है कि यहाँ जिस तरह एक नेकी लाख नेकियों के बराबर है इसी तरह एक गुनाह भी लाख गुनाहों के बराबर है। बल्कि कुछ औरतें तो तवाफ़ में काबा-ए-मौअज़्ज़मा के सामने भी इसी हालत से रहती हैं हालाँकि तवाफ़ में सत्र का छुपाना हमेशा फ़र्ज़ होने के अलावा वाजिब भी है तो एक फ़र्ज़ दूसरे वाजिब के तर्क से दो गुनाह किये वह भी बैतुल्लाह के सामने और ख़ास तवाफ़ की हालत में, बल्कि कुछ औरतें तो इतनी बे-हयाई दिखाती हैं कि तवाफ़ करने में और ख़ासतौर पर हजर-ए-असवद को बोसा देने में मर्दों में घुस जाती हैं उनका बदन मर्दों के बदन से लगता रहता है मगर उनको इसकी कुछ परवाह नहीं रहती हालाँकि तवाफ़ या हजर-ए-असवद को बोसा देना सवाब के लिए किया जाता है मगर वह औरतें सवाब के बदले गुनाह मोल लेती हैं लिहाज़ा इन बातों की तरफ़ हाजियों को ख़ास तौर पर ध्यान देना चाहिए और उनके साथ जो औरतें हों सख़्ती के साथ उन्हें ऐसी हरकतों से मना करना चाहिए वरना ख़ुद मर्द भी गुनाहगार होंगे।
  • मुस्तहब यह है कि बा-वुज़ू सई करें और कपड़े भी पाक हों और बदन भी हर क़िस्म की निजासत (नापाकी) से पाक हो और सई शुरू करते वक़्त नीयत कर लें।
  • सई के सातों फेरे एक के बाद एक करें अगर अलग-अलग तौर पर किये तो दोबारा अदा करें और अब सात फेरे करें कि पै दर पै न होने से सुन्नत तर्क हो गई।
  • अगर सई करने में जमाअत क़ायम हुई या जनाज़ा आया तो सई छोड़ कर नमाज़ में मशग़ूल हों फिर नमाज़ के बाद जहाँ से सई छोड़ी थी वहीं से पूरी कर लें।
  • सई की हालत में फ़ुज़ूल और बेकार बातें सख़्त नामुनासिब हैं। सई एक ऐसी इबादत है जो बार-बार नसीब नहीं हो सकती लिहाज़ा फ़ुज़ूल बातें कर के इस मुबारक वक़्त को बर्बाद न करें।
  • हज की सई अगर तवाफ़-ए-क़ुदूम के बाद और तवाफ़-ए-ज़ियारत से पहले करें तो सई में भी तलबियाह ‌यानि “लब्बैक…” पढ़ें। उमरा की सई में तलबियाह न पढ़ें, उमरा करने वालों का तलबियाह तवाफ़ के वक़्त ख़त्म हो जाता है।

सई से फ़ारिग़ होने के बाद लेकिन हल्क़ से पहले मस्जिद-ए-हराम में आकर दो रकअत नफ़्ल अदा करना मुस्तहब है बशर्ते कि मकरूह वक़्त न हो, मरवा पर पढ़ना मकरूह है, क्योंकि यह बिदअत है।  

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