तवाफ़ के लिये लाज़िम (वाजिबात-ए-तवाफ़)

तवाफ़ के लिये लाज़िम (वाजिबात-ए-तवाफ़)

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

  • तहारत यानि हर तरह की नापाकी जिससे ग़ुस्ल या वुज़ू लाज़िम हो जाता है उससे पाक होना।
  • सत्र-ए-औरत यानि शरीयत मे जितना जिस्म का हिस्सा ढका रहना लाज़िम है उसका ढका रहना।
  • जो शख़्स पैदल चल सकता हो उसे पैदल तवाफ़ करना।
  • दाहिनी तरफ़ से तवाफ़ करना यानि हजर-ए-असवद से ख़ाना-ए-काबा के दरवाज़े की तरफ़ चलना।
  • हतीम को शामिल करके तवाफ़ करना।
  • पूरा तवाफ़ करना यानि पूरे सात चक्कर लगाना।
  • हर तवाफ़ के बाद दो रकअत नमाज़ पढ़ना।

नोटः- ख़्याल रहे कि वाजिबात का हुक्म यह है कि अगर किसी वाजिब को तर्क करेगा तो तवाफ़ का “इआदा” (यानि दोहराना) वाजिब होगा अगर इआदा नहीं किया तो उसकी जज़ा वाजिब होगी

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