तवाफ़

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

तवाफ़ के मानी हैं किसी चीज़ के चारों तरफ़ चक्कर लगाना। आमतौर पर उमरा या हज के दौरान ख़ाना-ए-काबा के चारों तरफ़ एक चक्कर लगाने को “शौत” कहते हैं और सात (7) शौत या चक्कर पूरा करने को तवाफ़ कहते हैं।

 

तवाफ़ सात(7) तरह के होते हैं-

तवाफ़-ए-क़ुदूमः

आफ़ाक़ी” यानि बाहर से आने वाला शख़्स जो हज का एहराम बाँधकर मस्जिद-ए-हराम में दाख़िल हो तो वह जो तवाफ़ करेगा उसको तवाफ़-ए-क़ुदूम कहते हैं। यह बाहर से आने वाले उन लोगों के लिये सुन्नत है जो हज-ए-क़िरान या हज-ए-अफ़राद का एहराम बाँध कर दाख़िल हों, तमत्तो या उमरा करने वालों के लिए सुन्नत नहीं है और न ही मक्का में रहने वालों के लिए।

तवाफ़-ए-ज़ियारतः-

यह हज का रुकुन है इसके बिना हज पूरा नहीं होता। इसको तवाफ़-ए-रुकुन, तवाफ़-ए-हज, तवाफ़-ए-फ़र्ज़ और तवाफ़-ए-अफ़ाज़ा भी कहते हैं। इसका वक़्त दस (10) ज़िलहज्जा की सुबह सादिक़ (फ़ज्र के वक़्त) से शुरू होता है और बारह (12) ज़िलहिज्जा तक करना वाजिब है। देर होने पर दम वाजिब होता है।

 

तवाफ़-ए-विदाः-

रमी जमरात यानि शैतानों को कंकरियाँ मारने के बाद यानि हज के लगभग सब अमाल पूरे करने बाद सबसे आख़िर में जो तवाफ़ किया जाता है उसे तवाफ़-ए-विदा या तवाफ़-ए-सदर कहते हैं। यह तवाफ़ बाहरी हाजियों के लिये यह वाजिब।

तवाफ़-ए-उमराः-उमरा करने वालों के लिये यह रुकुन और फ़र्ज़ है।

 

तवाफ़-ए-नज़रः- नज़र मानने वालों पर यह वाजिब है।

 

तवाफ़-ए-तहय्यतः- मस्जिद-ए-हराम मे दाख़िल होने पर यह तवाफ़ किया जाता है जैसे और दूसरी मस्जिदों में दाख़िल होने पर नमाज़ तहय्यतुल मस्जिद पढ़ी जाती है यानि यह तवाफ़ तहय्यतुल मस्जिद का क़ायम मुक़ाम है।

तवाफ़-ए-नफ़्लःबाहर से जो हज या उमरा करने जाएं उनके लिये नफ़्ल नमाज़ पढ़ने से बेहतर यह है कि नफ़्ली तवाफ़ करें, क्योंकि नफ़्ल नमाज़ तो कहीं भी पढ़ी जा सकती है मगर तवाफ़ करने का मौक़ा और कहीं नहीं मिलेगा। यह तवाफ़ किसी वक़्त भी किया जा सकता है और इसमें एहराम की पाबंदियाँ भी नहीं होतीं।

हुज़ूर-ए-अकरमگ का फ़रमान है कि

अल्लाह तआला बैतुल्लाह पर हर रोज़ 120 रहमतें नाज़िल फ़रमाता है जिनमें से 60 रहमतें तवाफ़ करने वालों के लिये हैं, 40 रहमतें नमाज़ पढ़ने वालों के लिये और 20 बैतुल्लाह को देखने वालों के लिये”

(हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बासک से रिवायत)

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