रोज़े के मकरूहात

रोज़े के मकरूहात

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

रोज़े के मकरूहात वह है जिनसे रोज़े के सवाब में कमी आती है और कुछ में गुनाह भी होता है। लिहाज़ा इनसे बचना ज़रूरी है।

रोज़े के मकरूहात बारे में कुछ अहादीस-ए-नबवीگ    

  • जो बुरी बात कहना और उस पर अमल करना न छोड़े तो अल्लाह तआला को इसकी कुछ हाजत नहीं कि उसने खाना-पीना छोड़ दिया है।

(बुख़ारी व अबू दाऊद व तिर्मिज़ी व निसाई व इब्ने माजा, अबू हुरैराک से रिवायत)

  • रोज़ा सिपर (ढाल) है जब तक उसे फाड़ा न हो। अर्ज़ की गई किस चीज़ से फाड़ेगा। इरशाद फ़रमाया झूठ या ग़ीबत से।

(बैहक़ी अबू उबैदा और तिबरानी , अबू हुरैराک से रावी)

  • रोज़ा इसका नाम नहीं कि खाने और पीने से बाज़ रहना, रोज़ा तो यह है कि बेहूदा बातों से बचा रहे।

(इब्ने ख़ुज़ैमा व इब्ने हिब्बान व हाकिम, अबू हुरैराک     से रावी )

रोजे के मकरूहात बारे में कुछ मसाईल

  • औरत का बोसा लेना, गले लगाना और बदन छूना या और कोई ऐसा काम करना जिससे शहवत (Sexual Desire) बढ़े मकरूह है।
  • चबाने के लिए यह उज़्र है कि इतना छोटा बच्चा है कि रोटी नहीं खा सकता और कोई नर्म ग़िज़ा नहीं जो उसे खिलाई जाये और न कोई बे-रोज़ादार ऐसा है जो उसे चबा कर दे दे तो बच्चे के खिलाने के लिए रोटी वग़ैरा चबाना मकरूह नहीं।
  • रोज़ादार को बिना उज़्र (शरई वजह) किसी चीज़ का चखना या चबाना मकरूह है।
  • झूठ, चुग़ली, ग़ीबत, गाली देना, बेहूदा बात, किसी को तकलीफ़ देना कि यह चीज़ें वैसे भी नाजाइज़ व हराम हैं, रोज़े में और ज़्यादा हराम और इन की वजह से रोज़े में कराहत आती है।
  • चखने के लिए उज़्र यह है कि जैसे किसी औरत का शौहर या बांदी या ग़ुलाम का आक़ा बदमिज़ाज है कि नमक कम या ज़्यादा होगा तो आक़ा बहुत नाराज़ होगा तो इस वजह से चखने में हर्ज नहीं।
  • चखने का वह मतलब नहीं जो आजकल आमतौर पर देखने में आता है कि किसी चीज़ का मज़ा मालूम करने के लिये उसमें से थोड़ा खा लिया । ऐसा हरगिज़ नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से तो रोज़ा ही टूट जाता है और कफ़्फ़ारा भी लाज़िम हो सकता है। चखने का मतलब यह है कि ज़बान पर रखकर मज़ा मालूम करके उसे थूक दे उसमें से हलक़ में कुछ न जाने पाये और थूकने के बाद भी अगर मुँह में उसका मज़ा महसूस हो तो कुल्ली कर लेना चाहिये।
  • ज़ीनत (सिंगार) के लिए सुर्मा लगाना या इसलिए तेल लगाया कि दाढ़ी बढ़ जाये जबकि एक मुठ्ठी दाढ़ी है तो ये दोनों बातें मकरूह हैं।
  • रोज़े में कुल्ली करने और नाक में पानी चढ़ाने में ज़्यादती करना मकरूह है कुल्ली में ज़्यादती करने का यह मतलब है कि मुँह भर के पानी लें।
  • रोज़े की वजह से परेशानी ज़ाहिर करने के लिए भीगा कपड़ा लपेटना मकरूह है कि इबादत में दिल तंग होना अच्छी बात नहीं।
  • पानी के अन्दर रियाह (हवा) ख़ारिज करने से रोज़ा नहीं जाता मगर मकरूह है और रोज़ादार को इस्तिन्जा में ज़्यादती करना भी मकरूह है । इस्तिन्जा में ज़्यादती करने का मतलब यह है कि जैसे और दिनों में हुक्म है कि इस्तिन्जा करने में नीचे को ज़ोर दिया जाये और रोज़े में यह मकरूह है।
  • मुँह में थूक इकट्ठा करके निगल जाना बग़ैर रोज़े के भी नापसन्द है और रोज़े में मकरूह।
  • सहरी का खाना और उसमें देर करना मुस्तहब है मगर इतनी देर करना मकरूह है कि सुबह सादिक़ होने का शक हो जाये।
  • इफ़्तार में जल्दी करना मुस्तहब है मगर इफ़्तार उस वक़्त करें कि ग़ुरूब का ग़ालिब गुमान हो जब तक गुमान ग़ालिब न हो इफ़्तार न करें चाहे अज़ान हो गई हो और बादल वाले दिनों में इफ़्तार में जल्दी नहीं करनी चाहिए।

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