निजासते ग़लीज़ा (बहुत ज़्यादा नापाक चीज़ें)

निजासते ग़लीज़ा (बहुत ज़्यादा नापाक चीज़ें)

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

बहुत ज़्यादा नापाक चीज़ों को निजासते ग़लीज़ा कहते हैं। इसका हुक्म ज़्यादा सख़्त है।  ऐसी निजासत के बारे में हुक्म जानने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि यह किस हालत में है यानि गाढ़ी हैं या पतली हैं और कितनी है।

मिक़दार (Quantity) और हालत (State) के हिसाब से इसके अलग-2 हुक्म  हैं जो इस तरह हैं।

  • यह अगर कपड़े या बदन में एक दिरहम (भारत मे चलने वाले एक रुपये के छोटे सिक्के के बराबर) से ज़्यादा लग जाये तो उसको पाक करना फ़र्ज़ है अगर बिना पाक किये नमाज़ पढ़ ली तो होगी ही नहीं। अगर जान बूझकर पढ़ी तो गुनाह भी है। अगर इस हुक्म को हल्का जाना तो कुफ़्र है।
  • अगर दिरहम के बराबर है तो पाक करना वाजिब है। बिना पाक किये नमाज़ पढ़ी तो मकरूहे तहरीमी हुई यानि नमाज़ का लौटाना लाज़िम है, जान बूझ कर पढ़ी तो गुनाहगार भी हुआ।
  • अगर दिरहम से कम है तो पाक करना सुन्नत है। बिना पाक किये नमाज़ तो हो जायेगी मगर सुन्नत के ख़िलाफ़ है इसलिए लौटाना बेहतर है।
  • अगर निजासत गाढ़ी है जैसे पाख़ाना, लीद या गोबर तो दिरहम के बराबर या कम या ज़्यादा का मतलब यह है कि वज़न में उसके बराबर या कम या ज़्यादा हो और दिरहम का वज़न लगभग तीन ग्राम होता है।
  • निजासत अगर पतली है जैसे पेशाब या शराब तो दिरहम से मुराद उसका घेराव है और शरीयत के हिसाब से हथेली की गहराई के बराबर है यानि हथेली ख़ूब फैला कर बराबर रखें और उस पर आहिस्ता से इतना पानी डालें कि उससे ज़्यादा पानी न रुक सके अब पानी का जितना फैलाव है उतना बड़ा दिरहम समझा जायेगा, जो लगभग यहाँ के एक रुपये के छोटे सिक्के के बराबर है।
  • किसी कपड़े या बदन पर कुछ जगहों पर निजासते ग़लीज़ा लगी लेकिन किसी जगह दिरहम के बराबर नहीं मगर सबको मिलाकर दिरहम के बराबर है तो निजासत दिरहम के बराबर समझी जायेगी और ज़्यादा है तो ज़्यादा यानि इकट्ठा करके जाँचने पर ही हुक्म दिया जायेगा।
  • नजिस तेल कपड़े पर गिरा और फैल कर दिरहम के बराबर हो गया तो पाक करना वाजिब है।

जब यह पता चल गया कि निजासते ग़लीज़ा का इतना सख़्त हुक्म है कि थोड़ी सी बे एहतियाती से कुफ़्र तक की नौबत आ जाती है तो यह जानना भी बहुत ज़रूरी हो गया कि कौन कौन सी चीज़ें इसमें शामिल हैं।

निजासते में ग़लीज़ा कौन-2 सी चीज़ें शामिल हैं

  • इन्सान के जिस्म से निकलने वाली निजासतें जैसे पाख़ाना, पेशाब, बहता ख़ून, पीप, मुँह भर उल्टी, हैज़़ निफ़ास और इस्तिहाज़ा का ख़ून, मनी, मज़ी और वदी निजासते ग़लीज़ा हैं।
  • दुखती आँख से और नाफ़ या पिस्तान (Breast) से दर्द के साथ निकलने वाला पानी निजासते ग़लीज़ा है।
  • दूध पीते बच्चों का पेशाब निजासते ग़लीज़ा है। यह जो मशहूर है कि दूध पीते बच्चों का पेशाब पाक है बिल्कुल ग़लत है। दूध पीता बच्चा अगर मुँह भर दूध डाल दे वो भी निजासते ग़लीज़ा है।
  • आदमी की खाल अगर नाख़ून बराबर भी थोड़े पानी यानि दह-दर-दह से कम में पड़ जाये तो वह पानी नापाक हो जायेगा और नाख़ून गिर जाये तो नापाक नहीं होगा।
  • हराम जानवरों में सुअर नजिसुल ऐ़न (कुल नापाक) है, किसी तरह पाक नहीं हो सकता, उसकी हर चीज़ जैसे ख़ून, गोश्त, चर्बी, दूध, हड्डी, पाख़ाना, पेशाब, बाल, खाल, राल वग़ैरा सब निजासते ग़लीज़ा हैं।
  • वह जानवर जिनका खाना हराम है, जैसे कुत्ता, शेर, लोमड़ी, बिल्ली, चूहा, गधा, ख़च्चर, हाथी और भेड़िया वग़ैरा इनका पाख़ाना, पेशाब, ख़ून, जुगाली, गोश्त, चर्बी, पित्ता, दूध, मुँह की राल, हाथी की सूंड की रतूबत, घोड़े की लीद सब निजासते ग़लीज़ा है।
  • मुर्दार का गोश्त और चर्बी निजासते ग़लीज़ा है।
  • हलाल जानवर जैसे बकरी वग़ैरा को किसी ग़ैर मुस्लिम ने ज़िबह किया तो उसका गोश्त, खाल सब हराम और निजासते ग़लीज़ा हो गया।
  • बक़राईद पर कुछ लोग कम इल्मी की वजह से किसी ग़ैर मुस्लिम क़साई को बुला लेते हैं यह ग़लत है क़ुरबानी चाहे दूसरे या तीसरे दिन करा लें लेकिन मुसलमान ही से कराएं।
  • हलाल जानवर का ख़ून, जुगाली, गोबर, मेंगनी निजासते ग़लीज़ा हैं।
  • जो परिन्दा ऊँचा न उड़े जैसे मुर्ग़ी और बत्तख़ (छोटी हो या बड़ी) की बीट निजासते ग़लीज़ा है।
  • शराब और दूसरी नशा लाने वाली चीज़ें जैसे स्प्रिट, अफ़ीम वग़ैरा निजासते ग़लीज़ा हैं।
  • साँप का पाख़ाना, पेशाब और उस जंगली साँप और मेंढक का गोश्त जिनमें बहता ख़ून होता है चाहे ज़िबह किये गये हों और उनकी खाल चाहे पका ली गई हो निजासते ग़लीज़ा हैं।
  • छिपकली या गिरगिट का ख़ून निजासते ग़लीज़ा हैं।
  • अगर नमाज़ पढ़ी और जेब वग़ैरा में शीशी है जिसमें पेशाब/ख़ून/शराब है तो नमाज़ नहीं होगी। जेब में अंडा है ओैर उसकी ज़र्दी ख़ून हो चुकी है तो नमाज़ हो जायेगी।
  • अगर निजासते ग़लीज़ा ख़फ़ीफ़ा में मिल जाये तो सब ग़लीज़ा है।

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