ईदैन का बयान

ईदैन का बयान

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

ईद यानि ख़ुशी का दिन। अल्लाह तआला ने अपने अपने हबीब की उम्मत के लिये दो दिन मुकार्रर किये कि ख़ुशियाँ मनायें। एक ईद तो रमज़ान के रोज़े पूरे होने के बाद मनाई जाती है जिसको ईदुल फ़ित्र कहते हैं और दूसरी ईद उस ज़िलहिज्जाह की दस तारीख़ को मनाई जाती है जिसे ईदुल अज़हा कहते हैं. दोनों ईदों यानि ईदैन को मनाने के अलग-अलग तरीक़े, मक़सद और अहकाम हैं जिनको हम अपने प्यारे नबी के प्यारे –प्यारे फ़रमान से जानने की कोशिश करते हैं।

  • जो ईदैन की रातों में क़ियाम करे उसका दिल न मरेगा जिस दिन लोगों के दिल मरेंगे।

(इब्ने माजा व अबू उमामाک से रिवायत)

  • हुज़ूर अक़दसگ जब मदीने में तशरीफ़ लाए उस ज़माने में अहले मदीना साल में दो दिन ख़ुशी करते थे मेहरगान (पतझड़ का मौसम) व नैरोज़। फ़रमाया यह क्या दिन हैं लोगों ने अर्ज़ किया जाहिलियत में हम इन दिनों में ख़ुशी करते थे। फ़रमाया अल्लाह तआला ने उनके बदले में इनसे बेहतर दो दिन तुम्हें दिये ईदे अज़हा व ईदुल फ़ित्र के दिन।

(अबू दाऊद व अनस ک से रिवायत)

  • हुज़ूर अक़दसگ ईदुल फ़ित्र के दिन कुछ खाकर नमाज़ के लिए तशरीफ़ ले जाते और ईदे अज़हा को न खाते जब तक नमाज़ न पढ़ लेते।

(तिर्मिज़ी, इब्ने माजा, दारमी व बुरीदाک से रिवायत)

  • ईदुल फ़ित्र के दिन तशरीफ़ न ले जाते जब तक चन्द खजूरें न तनावुल फ़रमा लेते और खजूरें ताक़ (Odd) होतीं यानी तीन, पाँच, सात वग़ैरा।

(बुख़ारी की रिवायत अनसک से)

  • ईद को एक रास्ते से तशरीफ़ ले जाते और दूसरे से वापस होते।

(तिर्मिज़ी व दारमी ने अबू हुरैराک से रिवायत)

ईद के मुताल्लिक़ ज़रूरी मसाइल

  • ईदैन की नमाज़ वाजिब है मगर सब पर नहीं बल्कि उन्हीं पर जिन पर जुमा वाजिब है और इसकी अदा की वही शर्तें हैं जो जुमे के लिए हैं।
  • जुमे और ईदैन में एक फ़र्क़ यह है कि जुमे में ख़ुतबा शर्त है और ईदैन में सुन्नत अगर जुमे में ख़ुतबा न पढ़ा तो जुमा न हुआ और इसमें न पढ़ा तो नमाज़ हो गई मगर बुरा किया।
  • दूसरा फ़र्क़ यह है कि जुमे का ख़ुतबा नमाज़ से पहले है और ईदैन का नमाज़ के बाद अगर पहले पढ़ लिया तो बुरा किया मगर नमाज़ हो गई लौटाई नहीं जायेगी और ख़ुतबे को भी नहीं दोहराया जाएगा।
  • ईदैन में न अज़ान है न इक़ामत सिर्फ़ दो बार इतना कहने की इजाज़त है ‘अस़्स़लातुजामिअह’।
  • बिना वजह के ईद की नमाज़ छोड़ना गुमराही व बुरी बिदअत है।

ईद के दिन ये काम मुस्तहब हैं।

  1. हजामत (यानि दाढ़ी और बाल) बनवाना।
  2. नाख़ून तरशवाना।
  3. ग़ुस्ल करना।
  4. मिस्वाक करना।
  5. अच्छे कपड़े पहनना नया हो तो नया वरना धुला हुआ।
  6. अंगूठी पहनना
  7. ख़ुश्बू लगाना
  8. सुबह की नमाज़ मुहल्ले की मस्जिद में पढ़ना ।
  9. ईदगाह जल्द जाना
  10. नमाज़ से पहले सदक़ा-ए- फ़ित्र अदा करना (ईदुल फित्र में)।
  11. ईदगाह को पैदल जाना ।
  12. दूसरे रास्ते से वापस आना।
  13. नमाज़ को जाने से पहले चन्द खजूरें खा लेना तीन, पाँच, सात या कम या ज़्यादा मगर ताक़     (Odd) हों, खजूरें न हों तो कोई मीठी चीज़ खा ले नमाज़ से पहले कुछ न खाया तो गुनाहगार न हुआ मगर इशा तक न खाया तो इताब किया जाएगा।
  • ईद की नमाज़ के लिये सवारी पर जाने में भी हरज नहीं मगर जिसको पैदल जाने पर क़ुदरत हो उसके लिए पैदल जाना अफ़ज़ल है और वापसी में सवारी पर आने में हरज नहीं।
  • ईदगाह को नमाज़ के लिए जाना सुन्नत है चाहे मस्जिद में गुन्जाइश हो और ईदगाह में मिम्बर बनाने या मिम्बर ले जाने में हरज नहीं।
  • ख़ुशी ज़ाहिर करना कसरत से सदक़ा देना ईदगाह को इत्मीनान व वक़ार और नीची निगाह किये जाना आपस में मुबारक बाद देना मुस्तहब है और रास्ते में बलन्द आवाज़ से तकबीर न कहे।
  • नमाज़े ईद से पहले नफ़्ल नमाज़ बिल्कुल मकरूह है ईदगाह में हो या घर में उस पर ईद की नमाज़ वाजिब हो या नहीं।
  • औरत अगर चाश्त की नमाज़ घर में पढ़ना चाहे तो ईद की नमाज़ हो जाने के बाद पढ़े।
  • नमाज़े ईद के बाद भी ईदगाह में नफ़्ल पढ़ना मकरूह है घर में पढ़ सकता है

नमाज़े ईद का तरीक़ा

  1. पहले ऐसे नीयत करें – दो रकअत वाजिब ईदुल फ़ित्र या ईदे अज़हा की नीयत करके कानों तक हाथ उठाए और ‘अल्लाहु अकबर’ कह कर हाथ बांध ले।
  2. फिर सना पढ़े।
  3. फिर तीन तकबीरे इस तरह कहे – कानों तक हाथ उठाए और ‘अल्लाहु अकबर’ कहता हुआ हाथ छोड़ दे , फिर हाथ उठाए और ‘अल्लाहु अकबर’ कहकर हाथ छोड़ दे , फिर हाथ उठाए और ‘अल्लाहु अकबर’ कहकर हाथ बांध ले यानी पहली तकबीर में हाथ बांधे उसके बाद दो तकबीरों में हाथ लटकाए फिर चौथी तकबीर में बांध ले (इसको यूँ याद रखें कि जहाँ तकबीर के बाद कुछ पढ़ना है वहाँ हाथ बांध लिये जायें और जहाँ पढ़ना नहीं वहाँ हाथ छोड़ दिये जायें)।
  4. फिर इमाम ‘अऊज़ुबिल्लाह’ और ‘बिस्मिल्लाह’ आहिस्ता पढ़कर जहर (यानी ऊँची आवाज़) के साथ सूरह फ़ातिहा और दूसरी सूरह पढ़े
  5. फिर रुकू करें।
  6. फिर सजदा करके दुसरी रकअत के लिये खड़े हौं।
  7. दूसरी रकअत में पहले सूरह फ़ातिहा और दूसरी सूरह पढ़ी जायेगी।
  8. फिर तीन बार इस तरह करें कि कान तक हाथ ले जा कर ‘अल्लाहु अकबर’ कहे और हाथ न बांधे और चौथी बार बग़ैर हाथ उठाए ‘अल्लाहु अकबर’ कहता हुआ रुकू में जायें और बाक़ी नमाज़ पूरी करें।
  • इस से मालूम हो गया कि ईदैन में ज़ाइद तकबीरें छह हुईं तीन पहली में क़िरात से पहले और तकबीरे तहरीमा के बाद और तीन दूसरी में क़िरात के बाद और तकबीरे रुकू से पहले और इन सभी छः तकबीरों में हाथ उठाए जायेंगे और हर दो तकबीरों के दरमियान तीन तसबीह के पढ़ने की बराबर ठहरे।
  • इमाम ने छह तकबीरों से ज़्यादा कहीं तो मुक़तदी भी इमाम की पैरवी करे मगर तेरह से ज़्यादा में इमाम की पैरवी नहीं।
  • पहली रकअत में इमाम के तकबीर कहने के बाद मुक़तदी शामिल हुआ तो उसी वक़्त तीन तकबीरें कह ले चाहे इमाम ने क़िरात शुरू कर दी हो।
  • अगर तकबीरें न कहीं कि इमाम रुकू में चला गया तो खड़े खड़े न कहे बल्कि इमाम के साथ रुकू में जाए और रुकू में तकबीर कह ले।
  • अगर दूसरी रकअत में शामिल हुआ तो पहली रकअत की तकबीरें अभी न कहे बल्कि जब अपनी छूटी हुई रकअत पढ़ने खड़ा हो उस वक़्त कहे और दूसरी रकअत की तकबीरें अगर इमाम के साथ पा जाए तो बेहतर वरना इसमें भी वही तफ़सील है जो पहली रकअत के बारे में ज़िक्र की गई।
  • नमाज़ के बाद इमाम दो ख़ुतबे पढ़ेंगे इनको ख़ामोशी बैठकर सुनें।
  • ईदुल अज़हा के दिनों में तकबीरे तशरीक़ ज़िलहिज्ज के महीने में नौ तारीख़ की फ़ज्र से तेरह तारीख़ की अस्र तक हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद तीन मरतबा कही जाती हैं।
  • तकबीरे तशरीक़ यह है-

اَللّٰهُ اَكْبَرُ اَللّٰهُ اَكْبَرُ لَا اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَاَللّٰهُ اَكْبَرُ اَللّٰهُ اَكْبَرُ وَلِلّٰهِ الْحَمْدُ

  • तकबीरे तशरीक़ सलाम फेरने के बाद फ़ौरन वाजिब है।
  • नमाज़ हो चुकी और कोई शख़्स रह गया तो अगर दूसरी जगह मिल जाए पढ़ ले वरना नहीं पढ़ सकता।। बेहतर यह है कि यह शख़्स चार रकअत चाश्त की नमाज़ पढ़े।
  • क़ुर्बानी करनी हो तो मुस्तहब यह है कि पहली से दसवीं ज़िलहिज्जा तक न हजामत बनवाए न नाख़ून तरशवायें।
  • ईद की नमाज़ के बाद मुसाफ़हा व गले मिलना जैसा उमूमन मुसलमानों में रिवाज है बेहतर है कि इसमें अपनी ख़ुशी का इज़हार है

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