जमाअत से नमाज़ पढ़ना

जमाअत से नमाज़ पढ़ना

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

हर समझदार, बालिग़ और क़ादिर (Capable) पर जमाअत वाजिब है बिना किसी मजबूरी के एक बार भी छोड़ने वाला गुनाहगार और सज़ा का हक़दार है। जो शख़्स अज़ान सुनकर घर में इक़ामत का इंतज़ार करे वह गुनाहगार है और उसकी गवाही क़ुबूल नहीं की जायेगी।

अल्लाह के रसूल मुहम्मद گ ने फ़रमायाः-

  • जमाअत से नमाज़ पढ़ना अकेले पढ़ने से सत्ताइस (27) दर्जा बढ़कर है।
  • नमाज़े जमाअत से पीछे रह जाने वाला जानता कि इस जाने वाले के लिये क्या है तो घिसटता हुआ हाज़िर होता।

जमाअत के बारे में ज़रूरी मसाइल इस तरह हैं –

  • अगर वुज़ू में तीन-तीन बार आज़ा (हाथ पाँव वग़ैरा) धोने में यह ख़तरा है कि रकअत निकल जायेगी तो बेहतर यह है कि तीन-तीन बार न धोये और रकअत न छोड़े और अगर यक़ीन है रकअत तो मिल जायेगी मगर तकबीरे ऊला नहीं मिलेगी तो तीन-तीन बार धोना बेहतर है।
  • जमाअत छोड़ने के लिये शरई मजबूरियाँ यह है।
    • मरीज़ जिसे मस्जिद तक जाने में परेशानी हो।
    • अपाहिज या जिसका पाँव कट गया हो।
    • जिस पर फ़ालिज गिरा हो।
    • बूढ़ा जो मस्जिद तक जाने से आजिज़ है।
    • अंधा अगर्चे उसको कोई हाथ पकड़ कर मस्जिद तक पहुँचाने वाला हो।
    • सख़्त बारिश और रास्ते में बहुत कीचड़ का होना।
    • सख़्त सर्दी , अँधेरा और सख़्त आंधी।
    • माल या खाने के बरबाद होने का ख़ौफ़ हो।
    • क़र्ज़ा वापस माँगने वाले का ख़ौफ़ है और इसकीअभी क़र्ज़ा लौटाने की हैसियत नहीं है।
    • ज़ालिम का ख़ौफ़।
    • पाख़ाना, पेशाब या रीह (गैस) की हाजत हो।
    • खाना सामने है और नफ़्स को उसकी ख़्वाहिश हो।
    • क़ाफ़िला चले जाने का अन्देशा हो।
    • मरीज़ की देखभाल की वजह से कि जमाअत के लिये जाने से उसको तकलीफ़ होगी और घबराएगा।
  • औरतों को किसी भी नमाज़ की जमाअत के लिये मस्जिद में जाना जाइज़ नहीं।
  • जमाअत के लिये सफ़ों यानि लाईनों में मिलकर खड़े हों कि ख़ाली जगह न छोड़ें। और सब के कंधे बराबर हों।
  • औरत अगर मर्द के सामने या साथ में हो तो मर्द की नमाज़ जाती रहेगी । औरत चाहे उसकी बीवी, बेटी, बहन, बुढ़िया या जवान कोई भी हो लेकिन अगर बहुत छोटी बच्ची हो तो जाइज़ है। ( इसकी कुछ शर्तें हैं जानने के लिये इ-मेल कर सकते है)

 

जमाअत में पाँच चीज़ें वह हैं कि इमाम छोड़ दे तो मुक़तदी भी न करें और इमाम का साथ दें

  1.  ईद की नमाज़ की तकबीरें।
  2. क़ादा-ए-ऊला (यानि चार ‌या तीन रकअत वाली नमाज़ की दूसरी रकअत में अत्तहीयात के लिये बैठना)। क़ादा-ए-ऊला भूल जाने की सूरत में यह ज़रूरी है कि मुक़तदी इमाम को याद दिलाने की कोशिश करे। इमाम को याद दिलाने के लिये “अल्लाहु अकबर” या “सुब्हानल्लाह” कहा जाता है। इसमें तरीक़ा यह है कि जब तक सीधा खड़ा नहीं हुआ तो वापस क़ादे के लिये बैठ सकते हैं लिहाज़ा याद दिलाने पर इमाम अगर वापस आ गया तो ठीक और अगर सीधा खड़ा हो गया तो अब न बतायें क्योंकि उससे नमाज़ जाती रहेगी बल्कि ख़ुद भी क़ादा छोड़ दें और खड़े हो जायें।
  3. सजदा-ए-तिलावत।
  4. सजदा-ए-सहव।
  5. वित्र में दुआ-ए-क़ुनूत जबकि रुकू छूट जाने का ख़तरा हो वरना क़ुनूत पढ़कर रुकू करें।

 

जमाअत में चार चीज़ें वह हैं जो अगर इमाम करे तो मुक़तदी उसका साथ न दें।

  1. नमाज़ में कोई ज़ाइद (Extra) सजदा करने पर।
  2. ईद की नमाज़ की तकबीरों में ज़्यादती करने पर।
  3. नमाज़े जनाज़ा में पाँच तकबीरें कहने पर।
  4. पाँचवीं रकअत के लिये भूल कर खड़ा हो गया इसमें दो सूरते हैं।
    1) क़ादा-ए-आख़ीरा कर चुके हैं ‌यानि पहले इतनी दैर बैठे कि अत्तहीयात पढ़ी जा सके तो मुक़तदी इमाम का इंतज़ार करें अगर पाँचवी के सजदे से पहले लौट आया तो मुक़तदी भी उसका साथ दें उसके साथ सलाम फेरें और उसके साथ सजदा-ए-सहव करें और अगर पाँचवी का सजदा कर लिया तो मुक़तदी ख़ुद सलाम फेर लें।
    2) क़ादा-ए-आख़ीरा नहीं किया था और पाँचवी रकअत का सजदा कर लिया तो सब की नमाज़ फ़ासिद हो गई यानि दोबारा पढ़ी जायेगी चाहे मुक़तदी ने तशह्हुद (अत्तहीयात) पढ़कर सलाम फेर लिया हो।

जमाअत में नौ (9) चीज़ें ऐसी हैं कि इमाम अगर न करे तो मुक़तदी उसकी पैरवी न करें बल्कि अपनी नमाज़ पूरी करें।

  1.  तकबीरे तहरीमा में हाथ उठाना।
  2. सना पढ़ना जबकि इमाम अलहम्द शरीफ़ आहिस्ता पढ़ रहा हो।
  3. रुकू की तकबीरें।
  4. सजदों की तकबीरें।
  5. रुकू और सजदों की तस्बीहात।
  6. तसमिया (बिस्मिल्लाह)।
  7. तशह्हुद (अत्तहीयात) पढ़ना।
  8. सलाम फेरना।
  9. तकबीराते तशरीक़।

नोटः-

  1. मुक़तदी ने इस तरह नमाज़ पढ़ी कि सब रकअतों में इमाम से पहले रुकू-सुजूद कर लिया तो एक रकअत बाद में बग़ैर क़िरात के पढ़े।
  2. इमाम से पहले सजदा किया मगर उसके सिर उठाने से पहले इमाम भी सजदे में पहुँच गया तो सजदा हो गया मगर मुक़तदी को ऐसा करना हराम है।

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