जुमे का बयान

जुमे का बयान

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

अल्लाह तआला फ़रमाता है:-

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡۤا اِذَا نُوۡدِیَ لِلصَّلٰوۃِ مِنۡ یَّوْمِ الْجُمُعَۃِ فَاسْعَوْا اِلٰی ذِکْرِ اللّٰہِ وَ ذَرُوا الْبَیۡعَ ؕ ذٰلِکُمْ خَیۡرٌ لَّکُمْ اِنۡ کُنۡتُمْ تَعْلَمُوۡنَ ﴿﴾۹

(ऐ ईमान वालो! जब नमाज़ के लिए जुमे के दिन अज़ान दी जाए तो ज़िक्रे ख़ुदा की तरफ़ दौड़ो और ख़रीद व फ़रोख़्त छोड़ दो यह तुम्हारे लिए बेहतर है अगर तुम जानते हो।)

(सूरह अलजुमा, आयत-9)

जुमे के दिन के फ़ज़ीलत के बारे में कुछ अहादीस

हज़रत मुहम्मदگ के फ़रमाने आलीशान हैं कि-

  • बेहतर दिन कि आफ़ताब ने उस पर तुलू किया जुमे का दिन है। इसी में आदमگ पैदा किये गए और इसी में जन्नत में दाख़िल किये गए और इसी में जन्नत से उतरने का उन्हें हुक्म हुआ और क़ियामत जुमे ही के दिन क़ाइम होगी।

(मुस्लिम व अबू दाऊद व तिर्मिज़ी व नसई)

  • तुम्हारे अफ़ज़ल दिनों से जुमे का दिन है इसी में आदम گ पैदा किये गए और इसी में इन्तिक़ाल किया और इसी में नफ़्ख़ा है (यानी दूसरी बार सूर फूंका जाना) और इसी में सअक़ा है (यानी पहली बार सूर फूंका जाना) इस दिन में मुझ पर दुरूद की कसरत करो कि तुम्हारा दुरूद मुझ पर पेश किया जाता है। लोगों ने अर्ज़ की या रसूलल्लाह! उस वक़्त हुज़ूरگ पर हमारा दुरूद क्यों कर पेश किया जाएगा जब हुज़ूरگ इन्तिक़ाल फ़रमा चुके होंगे। फ़रमाया अल्लाह तआला ने ज़मीन पर अम्बिया के जिस्म खाना हराम कर दिया है।

(अबू दाऊद व नसई व इब्ने माजा व बैहक़ी )

  • जुमे के दिन मुझ पर दुरूद की कसरत करो कि यह दिन मशहूद (गवाही दिया हुआ यानी बुज़ुर्गी वाला) है इसमें फ़रिश्ते हाज़िर होते हैं और मुझ पर जो दुरूद पढ़ेगा पेश किया जाएगा हज़रत अबूदरदाک कहते हैं मैंने अर्ज़ की, और मौत के बाद? फ़रमाया बेशक अल्लाह ने ज़मीन पर अम्बिया के जिस्म खाना हराम कर दिया है, अल्लाह का नबी ज़िन्दा है रोज़ी दिया जाता है।

(इब्ने माजा)

  • जुमे में एक ऐसी साअत (एक वक़्त) है कि मुसलमान बन्दा अगर उसे पा ले और उस वक़्त अल्लाह तआला से भलाई का सवाल करे तो वह उसे देगा।

(बुख़ारी व मुस्लिम)

  • जुमे के दिन जिस साअत की ख़्वाहिश की जाती है उसे अस्र के बाद से ग़ुरूबे आफ़ताब (सूरज के डूबने) तक तलाश करो।

(तिर्मिज़ी)

  • अल्लाह तआला किसी मुसलमान को जुमे के दिन बे-मग़फ़िरत किये न छोड़ेगा।

(तबरानी औसत में)

  • जुमे के दिन और रात में चैबीस घन्टे में कोई घन्टा ऐसा नहीं जिसमें अल्लाह तआला जहन्नम से छह लाख आज़ाद न करता हो जिन पर जहन्नम वाजिब हो गया था।

(अबू यअला)

  • जो मुसलमान जुमे के दिन या जुमे की रात में मरेगा अल्लाह तआला उसे फ़ितनए क़ब्र से बचाएगा।

(अहमद व तिर्मिज़ी)

  • जो जुमे के दिन या जुमे की रात में मरेगा अज़ाबे क़ब्र से बचा लिया जाएगा और क़ियामत के दिन इस तरह आएगा कि उस पर शहीदों की मुहर होगी।

(अबू नईम)

जुमे की नमाज़ की फ़ज़ीलत पर कुछ अहादीस

  • जिसने अच्छी तरह वुज़ू किया फिर जुमे को आया और (ख़ुतबा) सुना और चुप रहा उसके लिए मग़फ़िरत हो जाएगी उन गुनाहों की जो इस जुमे और दूसरे जुमे के दरमियान हैं और तीन दिन और, और जिसने कंकरी छुई उसने लग़्व (बेकार काम) किया। यानी ख़ुतबा सुनने की हालत में इतना काम भी लग़्व में दाखि़ल है कि कंकरी पड़ी हो उसे हटा दे।

(मुस्लिम व अबू दाऊद व तिर्मिज़ी व इब्ने माजा)

  • जुमा कफ़्फ़ारा है उन गुनाहों के लिए जो इस जुमे और इसके बाद वाले जुमे के दरमियान हैं और तीन दिन ज़्यादा, और यह इस वजह से कि अल्लाह तआला फ़रमाता है जो एक नेकी करे उसके लिए उसकी दस मिस्ल है।

(तबरानी)

  • पाँच चीज़ें जो एक दिन में करेगा अल्लाह तआला उसको जन्नती लिख देगा।
  1. जो मरीज़ को पूछने जाए।
  2. जनाज़े में हाज़िर हो।
  3. रोज़ा रखे।
  4. जुमे को जाए।
  5. ग़ुलाम आज़ाद करे।

(सहीह इब्ने हिब्बान )

जुमा छोड़ने पर अज़ाब के बारे में कुछ अहादीस

  • लोग जुमा छोड़ने से बाज़ आयेंगे या अल्लाह तआला उनके दिलों पर मुहर कर देगा फिर ग़ाफ़िलीन में हो जायेंगे।

(मुस्लिम में अबू हुरैरह व इब्ने उमर से और निसाई व इब्ने माजा)

  • जो तीन जुमे सुस्ती की वजह से छोड़े अल्लाह तआला उसके दिल पर मुहर कर देगा।

(अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, नसई, इब्ने माजा, दारमी, इब्ने ख़ुज़ैमा, इब्ने हब्बान व हाकिम अबू जअद ज़मरी से)

  • मैंने क़स्द (इरादा) किया कि एक शख़्स को नमाज़ पढ़ाने का हुक्म दूँ और जो लोग जुमे से पीछे रह गए उनके घरों को जला दूँ।

(सही मुस्लिम शरीफ़)

  • जाबिरک से रिवायत है कि रसूलुल्लाहگ ने ख़ुतबा फ़रमाया और फ़रमाया ऐ लोगो! मरने से पहले अल्लाह की तरफ़ तौबा करो और मशग़ूल होने से पहले नेक कामों की तरफ़ सबक़त करो (आगे बढ़ो) और यादे ख़ुदा की कसरत और ज़ाहिर व पोशीदा (छुपा हुआ) सदक़े की कसरत से जो तअल्लुक़ात तुम्हारे और तुम्हारे रब के दरमियान हैं मिलाओ ऐसा करोगे तो तुम्हें रोज़ी दी जाएगी और तुम्हारी मदद की जाएगी, शिकस्तगी (तंगी, परेशानी) दूर फ़रमाई जाएगी और जान लो कि इस जगह इस दिन इस साल में क़ियामत तक के लिए अल्लाह ने तुम पर जुमा फ़र्ज़ किया जो शख़्स मेरी हयात में या मेरे बाद हल्का जानकर और ब-तौरे इन्कार जुमा छोड़े और उसके लिए कोई इमाम यानी हाकिमे इस्लाम हो आदिल या ज़ालिम तो अल्लाह तआला न उसकी परागंदगी (परेशानी) को जमा फ़रमाएगा न उसके काम में बरकत देगा आगाह उसके लिए न नमाज़ है, न ज़कात, न हज, न रोज़ा, न नेकी जब तक तौबा न करे और जो तौबा करे अल्लाह उसकी तौबा क़बूल फ़रमाएगा।

(इब्ने माजा)

  • जो अल्लाह और पिछले दिन पर ईमान लाता है उस पर जुमे के दिन नमाज़े जुमा फ़र्ज़ है मगर मरीज़ या मुसाफ़िर या औरत या बच्चा या ग़ुलाम पर, और जो शख़्स खेल या तिजारत में मशग़ूल रहा तो अल्लाह उससे बे-परवाह है और अल्लाह ग़नी हमीद है।

(दारक़़ुतनी)

जुमे के दिन नहाने और ख़ुशबू लगाने के बारे में कुछ अहादीस

  • जो शख़्स जुमे के दिन नहाने और जिस तहारत (पाकी यानि वुज़ू या ग़ुस्ल) की इस्तिताअत (ताक़त) हो करे और तेल लगाए और घर में जो ख़ुश्बू हो मले फिर नमाज़ को निकले और दो शख़्सों में जुदाई न करे यानी दो शख़्स बैठे हुए हों उन्हें हटाकर बीच में न बैठे और जो नमाज़ उसके लिए लिखी गई है पढ़े और इमाम जब ख़ुतबा पढ़े तो चुप रहे, उसके लिए उन गुनाहों की जो इस जुमे और दूसरे जुमे के दरमियान हैं मग़फ़िरत हो जाएगी।

(सही बुख़ारी)

  • जिसने जुमे के दिन वुज़ू किया बेहतर और अच्छा है और जिसने ग़ुस्ल किया तो ग़ुस्ल अफ़ज़ल है।

(अहमद व अबू दाऊद )

  • हुज़ूरگ फ़रमाते हैं इस दिन को अल्लाह तआला ने मुसलमानों के लिए ईद किया तो जो जुमे को आए वह नहाये और अगर ख़ुश्बू हो तो लगाए।

(इब्ने माजा की इब्ने अब्बासک से रिवायत)

  • जो जुमे के दिन नहाए उसके गुनाह और ख़तायें मिटा दी जाती हैं और जब चलना शुरू किया तो हर क़दम पर बीस नेकियाँ लिखी जाती हैं और दूसरी रिवायत में है हर क़दम पर बीस साल का अमल लिखा जाता है और जब नमाज़ से फ़ारिग़ हो तो उसे दो सौ बरस के अमल का अज्र मिलता है।

(तबरानी कबीर व औसत में सिद्दीक़े अकबरک व इमरान इब्ने हसीनک से रिवायत)

जुमे के लिए पहले से जाने का सवाब और गर्दने फलांगने की मनाही के बारे में अहादीस

  • हुज़ूरگ फ़रमाते हैं जो शख़्स जुमे के दिन ग़ुस्ल करे जैसे जनाबत का ग़ुस्ल है फिर पहली साअ़त में जाए तो गोया उसने ऊँट की क़ुर्बानी की और जो दूसरी साअ़त में गया उसने गाय की क़ुर्बानी की और जो तीसरी साअ़त में गया गोया उसने सींग वाले मेंढे की क़ुर्बानी की और जो चौथी साअ़त में गया गोया उसने मुर्गी नेक काम में ख़र्च की और जो पाँचवी साअ़त में गया गोया अण्डा ख़र्च किया फिर जब इमाम ख़ुतबे को निकला मलाइका ज़िक्र सुनने हाज़िर होते हैं।

(बुख़ारी, मुस्लिम, अबू दाऊद , तिर्मिज़ी वग़ैरा अबू हुरैरहک से रिवायत)

  • जब इमाम ख़ुतबे को निकलता है तो फ़रिश्ते दफ़्तर लपेट लेते हैं। किसी ने उनसे कहा तो जो शख़्स इमाम के निकलने के बाद आए उसका जुमा न हुआ। कहा हाँ हुआ तो लेकिन वह दफ़्तर में नहीं लिखा गया।

(इमाम अहमद, तबरानी अबू उमामाک से रिवायत )

  • जिसने जुमे के दिन लोगों की गर्दनें फ़लांगीं उसने जहन्नम की तरफ़ पुल बनाया।

(तिर्मिज़ी, इब्ने माजा में मआज़ इब्ने अनस जुहनीअपने वालिद से रिवायत करते हैं
और तिर्मिज़ी ने इस हदीस को ग़रीब कहा है)

  • एक शख़्स लोगों की गर्दनें फ़लांगते हुए आए और हुज़ूरگ ख़ुतबा फ़रमा रहे थे इरशाद फ़रमाया बैठ जा तूने ईज़ा पहुँचाई।

(अहमद, अबू दाऊद, निसाई में अब्दुल्लाह इब्ने बुस्रک से रिवायत)

जुमे के मुताल्लिक़ ज़रूरी मसाइल

  • जुमा फ़र्ज़ है और इसकी फ़र्ज़ीयत ज़ुहर से ज़्यादा सख़्त है और इसका इन्कार करने वाला काफ़िर है।
  • पहली अज़ान के होते ही जुमे के लिए तैयारी वाजिब है और हर वह काम जो नमाज़ की तैयारी में रुकावट बनें उनका छोड़ देना वाजिब यहाँ तक कि रास्ता चलते हुए अगर कुछ सामान वगैरा ख़रीदा – बैचा तो यह भी नाजाइज़ और मस्जिद में ख़रीद व फ़रोख़्त तो सख़्त गुनाह है।
  • खाना खाते में अज़ाने जुमा की आवाज़ आई तो अगर खाने कयह अंदेशा हो की वजह से जुमा छूट जाएगा तो खाना छोड़ दे और जुमे को जाए जुमे के लिए इत्मीनान और बुर्दबारी के साथ जाए।
  • जुमे को नमाज़ से पहले नमाज़ियों के सामने ख़ुतबा पढ़ना जुमे के लिये शर्त है।
  • ख़ुतबा ज़िक्रे इलाही का नाम है अगर सिर्फ़ एक बार ‘अलहम्दुलिल्लाह’ या ‘सुब्ह़ानल्लाह’ या ‘लाइला-ह इल्लल्लाह’ कहा इसी क़द्र से फ़र्ज़ अदा हो गया मगर इस तरह करना मकरूह है।
  • ख़तीब जब मिम्बर पर बैठे तो उसके सामने दोबारा अज़ान दी जाए सामने से यह मुराद नहीं कि मस्जिद के अन्दर मिम्बर से पास हो कि मस्जिद के अन्दर अज़ान कहने को फ़ुक़ाहाए इस्लाम मकरूह फ़रमाते हैं।
  • ख़ुतबा व नमाज़ में अगर ज़्यादा फ़ासिला हो जाए तो वह ख़ुतबा काफ़ी नहीं।
  • जब इमाम ख़ुतबे के लिए खड़ा हो उस वक़्त से नमाज़ ख़त्म होने तक नमाज़ व दूसरे ज़िक्र व हर तरह की बातचीत मना है लेकिन साहिबे तरतीब अपनी क़ज़ा नमाज़ पढ़ ले।
  • जो शख़्स सुन्नत या नफ़्ल ख़ुतबा शुरू होने से पहले से पढ़ रहा है जल्द-जल्द पूरी कर ले। लेकिन जब इमाम ख़ुतबे के लिये अपनी जगह से उठ जाये तो सुन्नत या नफ़्ल की नीयत न बाँधे।
  • मर्द अगर इमाम के सामने हो तो इमाम की तरफ़ मुँह करे और दाहिने बायें हो इमाम की तरफ़ मुड़ जाए और इमाम से क़रीब होना अफ़ज़ल है लेकिन इमाम से क़रीब होने के लिए लोगों की गर्दनें फ़ैलांगना जाइज़ नहीं लेकिन इमाम अभी ख़ुतबे को नहीं गया है और आगे जगह बाक़ी है तो आगे जा सकता है और ख़ुतबा शुरू होने के बाद मस्जिद में आया तो मस्जिद के किनारे ही बैठ जाए।
  • ख़ुतबा सुनने की हालत में दो ज़ानू बैठे जैसे नमाज़ में बैठते हैं।
  • जो चीज़ें नमाज़ में हराम हैं मसलन खाना, पीना, सलाम व जवाब वगै़रा यह सब ख़ुतबे की हालत में भी हराम हैं यहाँ तक कि किसी नेक काम के लिए कहना और बुरे से मना करना भी।
  • जब ख़ुतबा पढ़ा जाये तो तमाम हाज़िरीन पर सुनना और चुप रहना फ़र्ज़ है जो लोग इमाम से दूर हों और ख़ुतबे की आवाज़ उन तक नहीं पहुँचती उन्हें भी चुप रहना वाजिब है अगर किसी को बुरी बात करते देखें तो हाथ या सिर के इशारे से मना कर सकते हैं।
  • ख़ुतबा सुनने की हालत में देखा कि अंधा कुँए में गिरा चाहता है या किसी को बिच्छू वग़ैरा काटना चाहता है तो ज़ुबान से कह सकते हैं अगर इशारा या दबाने से बता सकें तो इस सूरत में भी ज़ुबान से कहने की इजाज़त नहीं।
  • ख़तीब ने मुसलमानों के लिए दुआ की तो सुनने वालों को हाथ उठाना या आमीन कहना मना है, कहेंगे तो गुनाहगार होंगे ख़ुतबे में दुरूद शरीफ़ पढ़ते वक़्त ख़तीब का दायें बायें मुँह करना बुरी बिदअत है।
  • हुज़ूर अक़दसگ का नामे पाक ख़तीब ने लिया तो हाज़िरीन दिल में दुरूद शरीफ़ पढ़ें ज़ुबान से पढ़ने की इस वक़्त इजाज़त नहीं। सिहाबा-ए-किराम के ज़िक्र पर इस वक़्त ک ज़ुबान से कहने की इजाज़त नहीं।
  • ख़ुतबा-ए-जुमा के अलावा और ख़ुतबों का सुनना भी वाजिब है मसलन ख़ुतबा-ए-ईदैन व निकाह वग़ैरा।
  • जुमा वाजिब होने के लिये ग्यारह शर्तें हैं। इन में से एक भी न पाई जाये तो फ़र्ज़ नहीं फिर भी अगर पढ़ेगा तो हो जाएगा बल्कि मर्द जो समझदार और बालिग़ हो उसके लिए जुमा पढ़ना अफ़ज़ल है और औरत के लिए ज़ुहर अफ़ज़ल है।
  • औरत का मकान अगर मस्जिद से बिल्कुल मिला हुआ है कि घर में इमामे मस्जिद की इक़्तिदा कर सके तो इसके लिए भी जुमा अफ़ज़ल है और नाबालिग़ ने जुमा पढ़ा तो नफ़्ल है कि उस पर नमाज़ फ़र्ज़ ही नहीं।
  • जिस पर जुमा फ़र्ज़ है उसे शहर में जुमा हो जाने से पहले ज़ुहर पढ़ना मकरूहे तहरीमी है । बल्कि इमाम इब्ने हुमामک ने फ़रमाया हराम है और पढ़ लिया जब भी जुमे के लिए जाना फ़र्ज़ है।
  • जुमा हो जाने के बाद ज़ुहर पढ़ने में कराहत नहीं बल्कि अब तो ज़ुहर ही पढ़ना फ़र्ज़ है अगर जुमा दूसरी जगह न मिल सके मगर जुमा तर्क करने का गुनाह उसके सिर रहेगा।
  • नमाज़े जुमा के लिए पहले से जाना, मिस्वाक करना, अच्छे और सफ़ेद कपड़े पहनना, तेल और ख़ुश्बू लगाना और पहली सफ़ में बैठना मुस्तहब है और ग़ुस्ल सुन्नत।
  • जुमे के दिन अगर सफ़र किया और ज़वाल से पहले शहर की आबादी से बाहर हो गया तो हर्ज नहीं वरना मना है।
  • जुमे के दिन या रात में सूरह कहफ़ की तिलावत अफ़ज़ल है।
  • सूरह दुख़ान पढ़ने की भी फ़ज़ीलत आई है।

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