नमाज़ के लिये ज़रूरी छः (6) शर्तें

नमाज़ के लिये ज़रूरी छः (6) शर्तें

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19789

بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

नमाज़ के लिये छः (6) शर्तें हैं अगर इनमें से एक भी शर्त पूरी न हो तो नमाज़ पढ़ ही नहीं सकते। लिहाज़ा हमारे लिये यह ज़रूरी है कि इनके बारे में पूरी जानकारी हासिल करके नमाज़ शुरू करने से पहले इनको पूरा करें ताकि अल्लाह तआला के हुक्म और अपने प्यारे नबी मुहम्मद گ के बताये हुए तरीक़े के मुताबिक़ नमाज़ अदा कर सकें ।

नमाज़ की शर्तें हैं-
1. तहारत यानि पाकी
2. जिस्म का ढकना (सत्रे औरत)
3. क़िब्ले को रुख़ करना (इस्तक़बाले क़िब्ला)
4. वक़्त
5. नीयत
6. तकबीरे तहरीमा (नीयत बाँधना)

1. नमाज़ की पहली शर्त तहारत (पाकी):-

इसका ज़िक्र हम ‘पाकी और सफ़ाई‘ के बाब (Chapter) में कर चुके हैं इसका मतलब यह है किः-

  • कपड़े और नमाज़ पढ़ने की जगह ज़ाहिरी निजासत से पाक हों।
  • जिस्म हुक्मी निजासत (हदस) से पाक हो मतलब वुज़ू/ग़ुस्ल किया हो।

तहारत (पाकी) की हक़ीक़त

ज़ाहिरी तौर पर तो कपड़े, जगह और जिस्म पाक होने से नमाज़ अदा हो जाती है लेकिन तहारत की रूह दिल की पाकी है यानि दिल मे भरे हुए बुरे अख़लाक़ और बुरे आमाल की गंदगी  को तौबा और शर्मिन्दगी से धोकर पाक किया जाये क्योंकि अल्लाह तो दिल देखता है।

तहारत तीन चीज़ों से मुकम्मल होती है-

  1. अपने दिल को कीना, हसद और अदावत से पाक करें।
  2. अपने बदन को गुनाहों से पाक करें।
  3. पानी को बर्बाद न करते हुए अपने आज़ा-ए-वुज़ू यानि वुज़ू में धोये जाने वाले जिस्म के हिस्सों को अच्छी तरह धोना।
2. नमाज़ की दूसरी शर्त जिस्म का ढकना (सत्रे औरत)

इसका मतलब यह है कि बदन के जिस हिस्से का छिपाना फ़र्ज़ है उसको छुपाना।

  • मर्द के लिए नाफ़ के नीचे से घुटनों के नीचे तक छिपाना फ़र्ज़ है। नाफ़ उसमें शामि़ल नहीं लेकिन घुटने शामिल हैं
  • औरतों के लिए सारा बदन, बाल ,गर्दन और कलाइयाँ छिपाना ज़रूरी है लेकिन मुँह, हथेलियों और पाँव के तलवों को खुला रखना चाहिये।

सत्रे औरत के बारे में कुछ ज़रूरी मसाइल

  • तहबन्द या पाजामा इस तरह पहना हो कि नाफ़ के नीचे का कुछ हिस्सा खुला हो और क़मीज़ या कुर्ते वग़ैरा से भी नहीं छुप रहा हो तो यह हराम है।
  • नमाज़ में किसी हिस्से का चौथाई से ज़्यादा हिस्सा खुला रहा तो नमाज़ नहीं होगी।
    तम्बीहः- आजकल लोग ऐसी पैंट (Low waist Pants) और शर्ट/टी-शर्ट पहन कर नमाज़ पढ़ते हैं कि शर्ट ऊपर को चढ़ जाती है और पैंट नीचे की तरफ़ खिसक जाती है जिसकी वजह से नाफ़ के नीचे का हिस्सा, कमर और कूल्हों तक का हिस्सा भी खुल जाता है। रुकू और सजदे में तो हालत और भी ख़राब हो जाती है। ख़ुदा के लिये नमाज़ मे ऐेसे लिबास न पहने क्योंकि इससे ख़ुद की नमाजें तो बर्बाद होंगी ही बल्कि दूसरों की निगाह खुली सत्र पर पड़ी तो उसका गुनाह भी अपने सिर आयेगा। बेहतर तो यह है कि आमतौर पर भी ऐसे लिबास से बचें। बाज़ लोग ऐसे हैं जो दूसरे लोगों के सामने नेकर पहन कर बे-झिझक आ जाते हैं जिसमें घुटने बल्कि रानें भी खुली रहती हैं यह भी हराम है और अगर इसकी आदत है तो फ़ासिक़ है।
  • बारीक कपड़ा जिसमें बदन चमकता हो उससे नमाज़ पढ़ी तो नहीं होगी।
  • दुपट्टे या चादर में से औरत के बालों की स्याही चमके तो नमाज़ नहीं होगी।
  • ऐसा कपड़ा जिससे सत्रे औरत न हो सके नमाज़ के अलावा पहनना भी हराम है।
  • मोटा कपड़ा जिससे बदन का रंग न चमकता हो मगर बदन से बिल्कुल ऐसा चिपका हुआ है कि देखने से उज़्व की बनावट मालूम होती है ऐसे कपड़े से नमाज़ तो हो जायेगी मगर उस उज़्व की तरफ़ दूसरों को निगाह करना जाइज़ नहीं और ऐसा कपड़ा लोगों के सामने पहनना भी मना है। औरतों के लिए चुस्त कपड़े पहनना और ज़्यादा सख़्ती से मना है।
  • बदन के जिन हिस्सों का छिपाना फ़र्ज़ है उनमें कोई उज़्व चौथाई से कम खुल गया तो नमाज़ हो जायेगी और अगर चौथाई उज़्व खुल गया और फ़ौरन छिपा लिया तो जब भी हो जायेगी लेकिन अगर इतनी देर खुला रहा कि तीन (3) बार सुब्हानल्लाह कहा जा सके या जानबूझ कर खोला गया चाहे फ़ौरन छिपा लिया हो तब नमाज़ नहीं होगी।

सत्रे औरत की हक़ीक़तः-

ज़ाहिरी तौर पर तो ऊपर दिये गये तरीक़े के मुताबिक़ कपड़े पहनने से नमाज़ के लिये ज़रूरी सत्रे औरत की शर्त पूरी हो जाती है और नमाज़ अदा हो जाती है लेकिन इस की हक़ीक़त यह है कि अपने बुरे कामों को जो दूसरे लोगों से छिप कर किये हों उसे अल्लाह से भी छिपायें और यह नामुमकिन है क्योंकि अल्लाह तआला से कोई चीज़ छिपी नहीं रह सकती इसलिये इन बुरे कामों से अपने आपको पाक करना ज़रूरी है। लिहाज़ा सत्रे औरत की रूह को हासिल करने के लिये लाज़िम है कि छिपकर किये हुए बुरे कामों पर शर्मिन्दा होकर यह पक्का इरादा करें कि आईंदा कोई गुनाह नही करेंगे।

सत्रे औरत के लिये लिबास तीन चीज़ों से मुकम्मल होता है-

  1. वह हलाल की कमाई से हासिल किया गया हो।
  2. निजासत से पाक हो।
  3. बनावट सुन्नत के मुताबिक़ हो, और तकब्बुर या लोगों को दिखाने के लिए उन कपड़ों को न पहना गया हो।
3. नमाज़ की तीसरी शर्त इस्तक़बाले क़िब्ला (क़िब्ले को रुख़ करना)

इसका मतलब है कि नमाज़ के लिये क़िब्ला यानि “काबा” की तरफ़ मुँह करना। यहाँ एक ध्यान में रखने वाली बहुत ज़रूरी बात यह है कि नमाज़ अल्लाह ही के लिये है और उसी के लिये पढ़ी जाये और उसी के लिये सजदा हो न कि काबा को। अगर किसी ने “मआज़ अल्लाह” काबे के लिये सजदा किया यह हराम व गुनाहे कबीरा किया और काबे की इबादत की नीयत तो खुला कुफ़्र है क्योंकि ख़ुदा के अलावा किसी और की इबादत कुफ़्र है।

क़िब्ले को रुख़ करने के मुताल्लिक़ ज़रूरी मसाइल

  • क़िब्ले की तरफ़ को रुख़ होने के यह मतलब है कि मक्का-ए-मुअज़्ज़मा में जो लोग हों वह ख़ास ख़ाना-ए-काबा की तरफ़ चेहरा रखें और मक्का-ए-मुअज़्ज़मा से बाहर रहने वाले लोग ख़ाना-ए-काबा की सिम्त (दिशा) की तरफ़ चेहरा करें और उनके के लिये यह रियायत भी है कि अगर चेहरे का रुख़ काबे की सिम्त से दायें या बायें जानिब 45 डिग्री तक हट भी जाये तो नमाज़ हो जायेगी।
  • अगर किसी शख़्स को किसी जगह क़िब्ले की सिम्त का सही अंदाज़ा नहीं हो रहा है और न ही कोई ऐसा मुसलमान है जो बता सके ‌या कोई और निशानी है जैसे सूरज, चाँद या सितारे वग़ैरा उन से अंदाज़ा कर सके तो ऐसे में हुक्म है कि “तहर्री” करे यानि सोचे और जिस तरफ़ क़िब्ला होना दिल में जमे उस तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ ले। ऐसे में बाद में क़िब्ले की सही सिम्त पता चल गई और यह भी मालूम हो गया कि क़िब्ले की तरफ़ नमाज़ नहीं पढ़ी थी जब भी नमाज़ हो गई उसे लौटाने की ज़रूरत नहीं है।
  • अगर कोई जानने वाला मौजूद था उससे मालूम नहीं किया ख़ुद ग़ौर करके किसी तरफ़ को पढ़ ली तो अगर क़िब्ले ही की तरफ़ मुँह था तो नमाज़ हो गई वरना नहीं।

क़िब्ला रू होने की हक़ीक़तः-

ज़ाहिरी तौर पर तो अपना रुख़ सब तरफ से हटा कर क़िब्ले की तरफ करने से यह शर्त पूरी हो जाती है मगर इसका राज़ यह है कि दिल को हर तरफ़ से हटा कर ख़ुदा की तरफ़ ले आयें और उसका ज़ाहिर और बातिन एक जैसा हो जाये। जिस तरह ज़ाहिरी क़िब्ला एक है इसी तरह दिल का क़िब्ला भी एक ही है यानि अल्लाह तआला और दिल का इधर-उधर भटकना ऐसा है जैसा नमाज़ में मुँह को फेरना।

हज़रत मुहम्मद گ ने फ़रमाया कि –

“जो शख़्स नमाज़ के लिये खड़ा हो, उसका मुँह, दिल और ख़्वाहिश सब अल्लाह की तरफ़ हों तो वह नमाज़ से ऐसे बाहर आता है जैसे आज ही माँ के पेट से पैदा हुआ हो।”

इस्तिक़बाले क़िब्ला तीन चीज़ों से मुकम्मल होता है।

  1. मुँह काबा की सिम्त हो।
  2. दिल अल्लाह की तरफ़ लगा हो।
  3. बहुत ही इन्किसारी से (‌ख़ुद को बहुत छोटा जानकर) हाज़िर हो।
4. नमाज़ की चौथी शर्त वक़्त

अल्लाह तआला क़ुरआन पाक में फ़रमाता है:-

اِنَّ الصَّلٰوۃَ کَانَتْ عَلَی الْمُؤْمِنِیۡنَ کِتٰبًا مَّوْقُوۡتًا

(बेशक नमाज़ ईमान वालों पर फ़र्ज़ है वक़्त मुक़र्रर किया हुआ)

(सुरह अननिसा, आयत-103)

मुसलमानों पर पूरे दिन में पाँच नमाज़ें फ़र्ज़ की गई हैं जो उनके मुक़र्रर किये हुए वक़्तों में पढ़ना ज़रूरी हैं। किसी वजह से मुक़र्ररा वक़्त में नहीं पढ़ सके तो नमाज़ क़ज़ा पढ़ी जायेगी। लेकिन यह बात ध्यान में रखना ज़रूरी है कि बग़ैर किसी ऐसी मजबूरी के जिसमें शरियत की तरफ़ से छूट है नमाज़ क़ज़ा करना बहुत सख़्त गुनाह है। पाँचों नमाज़ों के मुक़र्ररा वक़्त इस तरह हैं।

  1. फ़ज्रः- फ़ज्र की नमाज़ सुबह के वक़्त सूरज निकलने से पहले पढ़ी जाती है इसका सही वक़्त सुबह सादिक़ से सूरज की किरण चमकने तक है। सुबह सादिक़ वह रौशनी है जो पूर्व (East) में आसमान के उस किनारे पर चमकती है जहाँ से सूरज निकलने वाला है। आमतौर पर भारत और आस-पास के देशों में फ़ज्र का वक़्त लगभग 1 घंटा 20 मिनट तक रहता है।
  2. ज़ुहर व जुमाः- यह नमाज़ें दोपहर के वक़्त पढ़ी जाती हैं। इनका सही वक़्त सूरज ढलने से शुरू होकर उस वक़्त तक रहता है जब हर चीज़ की परछाई, ‘साया-ए-असली’ के अलावा दो गुना हो जाती है। मिसाल के तौर पर कोई चीज़ तीन (3) मीटर की है और उसका साया-ए-असली एक (1) मीटर है तो जब उसकी परछाई 7 मीटर की हो जायेगी तो ज़ुहर का वक़्त ख़त्म हो जायेगा। अस्ल में जैसे-जैसे सूरज चढ़ता रहता है किसी भी चीज़ की परछाई कम होती जाती है और एक वक़्त वह आता है कि जब सूरज अपने निकलने और डूबने की जगह के बिल्कुल बीच में आ जाता है उस वक़्त को ‘निस्फ़ुन्नहार’ कहते हैं इस वक़्त किसी भी चीज़ की परछाई सबसे कम होती है। इसी परछाई को ‘साया-ए-असली’ कहते हैं। इसके बाद सूरज ढलना शुरू हो जाता है और परछाई बढ़ने लगती है बस इसी वक़्त से ज़ुहर या जुमे का वक़्त शुरू हो जाता है।
  3. अस्रः- अस्र की नमाज़ का वक़्त ज़ुहर का वक़्त ख़त्म होने के फ़ौरन बाद से शुरू हो जाता है और सूरज डूबने तक रहता है। आमतौर पर भारत और आस-पास के देशों में अस्र का वक़्त लगभग 1 घंटा 35 मिनट तक रहता है।
  4. मग़रिबः- सूरज के ग़ुरूब होने (डूबने) से ग़ुरूबे शफ़क़ (यानि शफ़क़ के ख़त्म होने) तक रहता है। शफ़क़ उत्तर-दक्षिण में फैली उस सफ़ेदी को कहते हैं जो सूरज डूबने की जगह (पश्चिम) पर फैली लाली के ख़त्म होने के बाद ज़ाहिर होती है। इस सफ़ेदी के ख़त्म होने तक मग़रिब का वक़्त रहता है। आमतौर पर भारत और आस-पास के देशों में मग़रिब का वक़्त लगभग 1 घंटा 20 मिनट तक रहता है।
  5. इशाः- मग़रिब का वक़्त ख़त्म होने से लेकर सुबह सादिक़ यानि फ़ज्र का वक़्त शुरू होने तक रहता है। वित्र जिनका पढ़ना वाजिब है इशा की नमाज़ के बाद पढ़े जाते हैं।

नोटः- सूरज के निकलने, डूबने और निस्फ़ुन्नहार का वक़्त हर शहर में अलग होता है और उनके हिसाब से पूरे साल के 365 दिनों में हर नमाज़ का वक़्त निकाल कर अंग्रेज़ी महीनों के हिसाब से एक नक़्शा बना लिया जाता है जो हर शहर की इस्लामी किताबों की दुकानों पर या जामा मस्जिद वग़ैरा में आसानी से मिल जाता है। इसे नेट से भी डाउनलोड किया जा सकता है। लिहाज़ा इसे अपने साथ ज़रूर रखें ताकि नमाज़ों के वक़्त की पाबन्दी हो सके।

वक़्त की पाबन्दी तीन चीज़ों से मुकम्मल होती है।

  1. इतना इल्म रखता हो कि सूरज, चाँद और सितारों से वक़्त के मुक़र्रर करने में मदद ले सके।
  2. कान अज़ान की आवाज़ पर लगे रहें।
  3. दिल नमाज़ के वक़्त की पाबन्दी के लिये फ़िक्रमन्द रहे।
5. नमाज़ की पाँचवी शर्त नीयत

इसका मतलब है कि दिल में यह इरादा हो कि नमाज़ सिर्फ़ अल्लाह के वास्ते और उसका हुक्म पूरा करने के लिये पढ़ रहा है और यह कि किस वक़्त (यानि फ़ज्र, ज़ुहर वग़ैरा) कि कौनसी (यानि फ़र्ज़, सुन्नते वग़ैरा) नमाज़ पढ़ रहा है। नीयत में ज़ुबान का भी ऐतबार नहीं यानि अगर दिल में ज़ुहर का इरादा किया और ज़ुबान से अस्र निकल गया तब भी ज़ुहर की नमाज़ हो जायेगी। बेहतर यह है कि नीयत को ज़ुबान से इस तरह कहे “नीयत की मैने वास्ते अल्लाह तआला के, चार रकआत (या जितनी हों), नमाज़ फ़र्ज़ वक़्त ज़ुहर (या जो भी हो) का, “मुँह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़” अगर जमाअत से नमाज़ पढ़ रहा है तो इमाम कि इक़तिदा की भी नीयत करें यानि यह कहे “पीछे इस इमाम के”

नीयत तीन चीज़ों से मुकम्मल होती है।

  1. इसका इल्म हो कि कौन सी नमाज़ पढ़ रहा है।
  2. इस बात का इल्म हो कि अल्लाह की बारगाह में खड़ा हो रहा है और वह देख रहा है और डरता हुआ हाज़िर हो।
  3. यह इल्म हो कि अल्लाह दिल के भेदों को जानता है लिहाज़ा अपने दिल से दुनियावी ख़्यालात बिल्कुल ख़त्म कर दे।

नीयत के बारे में ज़रूरी मसाइल:-

  • नीयत का सबसे कम दर्जा यह है कि अगर उस वक़्त कोई पूछे कौन सी नमाज़ पढ़ता है तो फ़ौरन बिना देर किए बता दे अगर सोचकर बताया तो नमाज़ नहीं होगी।
  • फ़र्ज़ नमाज़ में ख़ास तौर पर फ़र्ज़ की नीयत ज़रूरी है सिर्फ़ नमाज़ की नीयत काफ़ी नहीं। अगर फ़र्ज़ियत जानता ही न हो जैसे पाँचों वक़्त नमाज़ पढ़ता है मगर उनकी फ़र्ज़ियत का इल्म नहीं नमाज़ नहीं होगी और उस पर उन तमाम नमाज़ों की क़ज़ा फ़र्ज़ है मगर जब इमाम के पीछे हो और यह नीयत करे कि इमाम जो नमाज़ पढ़ता है वही मैं भी पढ़ता हूँ तो यह नमाज़ हो जायेगी।
  • फ़र्ज़ में यह भी ज़रूरी है कि उस ख़ास नमाज़ (जैसे ज़ुहर या अस्र) की नीयत करे।
  • फ़र्ज़ क़ज़ा हुए हों तो उनमें दिन का और नमाज़ का तय करना ज़रूरी है। जैसे फुलाँ दिन की फुलाँ नमाज़ की नीयत करता हूँ।
  • अगर किसी के ज़िम्मे बहुत सी नमाज़ें क़ज़ा हैं और दिन तारीख़ भी याद न हो तो उसके लिये आसान तरीक़ा नीयत का यह है कि सब में पहली या सब में पिछली फुलाँ नमाज़ जो मेरे ज़िम्मे है।
6. नमाज़ की छठी शर्त तकबीरे तहरीमा

इसका मतलब है कि नमाज़ शुरू करने के लिये दोनो हाथों को कानों तक उठाकर ‘अल्लाहु अकबर’कहना। तकबीर कहते ही नमाज़ शुरू हो जाती है यह फ़र्ज़ है इसके बग़ैर नमाज़ नहीं होती। एक बात ध्यान में रखनी ज़रूरी है कि अगर किसी ने इमाम से पहले तकबीरे तहरीमा कह दी तो वह जमाअत में शामिल नहीं हुआ।

तकबीरे तहरीमा तीन चीज़ों से मुकम्मल होती है।

  1. सही मअनों में अल्लाह तआला की बड़ाई बयान करो और सही तौर पर अल्लाहु अकबर कहो।
  2. अपने दोनों हाथ कानों के बराबर तक उठाओ।
  3. तकबीर कहते हुए दिल भी हाज़िर हो और बहुत ताज़ीम के साथ तकबीर कहो।

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