नमाज़ में मकरूहात के बारे में कुछ अहादीस

नमाज़ में मकरूहात के बारे में कुछ अहादीस

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

मकरूह वह अमल या काम हैं जिन को इस्लाम में नापसन्द किया गया है  और इनसे बचने और नफ़रत (घिन्न) करने का हुक्म दिया गया है। मकरूह दो क़िस्म के हैं

  1. मकरूह-ए-तन्ज़ीही 
  2. मकरूह-ए-तहरीमी

 

मकरूह-ए-तन्ज़ीहीः-

वह काम जिनको नापसन्द किया गया है और इनसे बचने का हुक्म दिया गया मगर इनके करने से कोई गुनाह नहीं होता और छोड़ने पर बेहतर सवाब और इनामात मिलते हैं। इन कामों से नफ़रत करनी चाहिये और जहां तक हो सके इनसे बचते रहना चाहिये.  

मकरूह-ए-तहरीमी-

वह नापसन्दीदा और क़ाबिले नफ़रत काम जिनको करने से बिल्कुल मना फ़रमाया गया है। बग़ैर किसी शरई मजबूरी के अगर कोई यह काम करे वह गुनाहगार है। मकरूह-ए-तहरीमी का इन्कार करने वाला फ़ासिक़ कहलाता है

 

नमाज़ में मकरूहात के बारे में कुछ अहादीस

  • हुज़ूर अक़दस گ ने नमाज़ में कमर पर हाथ रखने से मना फ़रमाया।

(बुख़ारी व मुस्लिम)

  • नमाज़ के अन्दर इधर उधर देखने के बारे में सवाल करने पर आपگ ने फ़रमाया यह उचक लेना है कि बंदे की नमाज़ में से शैतान उचक ले जाता है।

(बुख़ारी व मुस्लिम)

  • जो बन्दा नमाज़ में है अल्लाह तआला की रहमते ख़ास उसकी तरफ़ मुतावज्जेह रहती है जब तक इधर उधर न देखे जब उसने अपना मुँह फेरा उसकी रहमत भी फिर जाती है।

(इमाम अहमद व अबू दाऊद)

  • अबू हुरैराहک कहते हैं मुझे मेरे ख़लील گ ने तीन बातों से मना फ़रमाया मुर्ग़ की तरह ठोंग मारने और कुत्ते की तरह बैठने और इधर उधर लोमड़ी की तरह देखने से।

(इमाम अहमद व अबू याला)

  • क्या हाल है उन लोगों का जो नमाज़ में आसमान की तरफ़ आँखें उठाते हैं उससे बाज़ रहें या उन की निगाहें उचक ली जायेंगी।

(बुख़ारी व अबू दाऊद व नसई व इब्ने माजा)

  • जब नमाज़ में किसी को जमाही आये तो जहाँ तक हो सके रोके कि शैतान मुँह में दाख़िल हो जाता है।

(मुस्लिम)

  • जब नमाज़ में किसी को जमाही आये तो जहाँ तक हो सके रोके और ‘हा’ न कहे कि यह शैतान की तरफ़ से है शैतान इससे हँसता है।

(सही बुख़ारी)

  • जब कोई अच्छी तरह वुज़ू करके मस्जिद के इरादे से निकले तो एक हाथ की उंगलियाँ दूसरे हाथ में न डाले कि वह नमाज़ में हो।

(इमाम अहमद व अबू दाऊद व तिर्मिज़ी)

  • हुज़ूर گ फ़रमाते हैं सब में बुरा वह चोर है जो अपनी नमाज़ से चुराता है सिहाबा ने अर्ज़ की या रसूलल्लाह! नमाज़ से कैसे चुराता है फ़रमाया कि रुकू व सुजूद पूरा नहीं करता।

(इमाम अहमद)

  • अल्लाह बंदे की उस नमाज़ की तरफ़ नज़र नहीं फ़रमाता जिसमें रुकू व सुजूद के दरमियान पीठ सीधी न करे।

(इमाम अहमद)

  • उम्मुल मोमिनीन उम्मे सलमा रज़ीअल्लाह अन्हा कहती हैं हमारा एक ग़ुलाम अफ़लाह नामी लड़का जब सजदा करता तो फूंकता, फ़रमाया हुज़ूर گ ने, ऐ अफ़लाह अपना मुँह ख़ाक आलूदा कर।

(तिर्मिज़ी)

  • अमीरुल मोमिनीन हज़रत अलीک से रिवायत है कि हुज़ूरگ फ़रमाते हैं जब तू नमाज़ में हो तो उंगलियाँ न चटका बल्कि एक रिवायत के मुताबिक़ मस्जिद में नमाज़ के इंतज़ार में उंगलियाँ चटकाने से भी मना फ़रमाया।

(इब्ने माजा)

  • रसूलुल्लाहگ ने कौवे की तरह ठोंग मारने और दरिंदे की तरह पाँव बिछाने से मना फ़रमाया और इससे मना फ़रमाया कि मस्जिद में कोई शख़्स जगह मुक़र्रर कर ले जैसे ऊँट जगह मुक़र्रर कर लेता है।

(अबू दाऊद व नसई व दारमी)

  • इब्ने अब्बासک से मरवी है- “फ़रमाते हैं हुज़ूरگ मुझे हुक्म हुआ कि सात हड्डियों पर सजदा करूँ मुँह और दोनों हाथ दोनों घुटने और दोनों पंजों पर और हुक्म हुआ कि कपड़े और बाल न समेटूँ।”

(सहीहैन)

  • हज़रत अलीک से रिवायत है कि- “रसूलुल्लाहگ ने फ़रमाया ऐ अली! मैं अपने लिये जो पसन्द करता हूँ तुम्हारे लिये पसन्द करता हूँ और अपने लिये जो मकरूह जानता हूँ तुम्हारे लिये मकरूह जानता हूँ, दोनों सजदों के दरमियान इक़आ न करना यानि इस तरह न बैठना कि सुरीन (कूल्हे) ज़मीन पर हों और घुटने खड़े हों  “।

(तिर्मिज़ी)

  • बुरीदाک से रिवायत है- “कि हुज़ूरگ ने इससे मना फ़रमाया कि मर्द सिर्फ़ पाजामा पहनकर नमाज़ पढ़े और चादर न ओढ़े”।

(अबू दाऊद, हाकिम मुसतद्रक में)

  • रिवायत है कि इब्ने उमरک ने नाफ़ेअ को दो कपड़े पहनने को दिये और यह उस वक़्त लड़के थे, उसके बाद मस्जिद में गये और नाफ़ेअ को एक कपड़े में लिपटे हुये नमाज़ पढ़ते देखा उस पर फ़रमाया क्या तुम्हारे पास दो कपड़े नहीं कि उन्हें पहनते। अर्ज़ की हाँ हैं। फ़रमाया बताओ अगर मकान से बाहर तुम्हें भेजूँ तो दोनों पहनोगे अर्ज़ की हाँ। फ़रमाया तो क्या अल्लाह तआला के दरबार के लिये ज़ीनत ज़्यादा मुनासिब है या आदमियों के लिये अर्ज़ की अल्लाह तआला के लिये

(अब्दुर्रज़्ज़ाक़ मुसन्ऩफ़ में)

  • अब्दुल्लाह इब्ने मसऊदک से रिवायत है कि हुज़ूरने फ़रमाया जो शख़्स नमाज़ में तकब्बुर से तहबन्द लटकाये उसे अल्लाह तआला की रहमत न “हिल” में है न “हरम” में। काबा शरीफ़ के आस पास का कुछ ख़ास हिस्सा हरम कहलाता है बाक़ी हिल कहलाता है यानि हरम के अलावा पूरी दुनिया हिल है)

(अबू दाऊद)

  • अबू हुरैराک से रिवायत है कि एक साहब तहबन्द लटकाये नमाज़ पढ़ रहे थे। इरशाद फ़रमाया जाओ वुज़ू करो। वह गये और वुज़ू करके वापस आये। किसी ने अर्ज़ की या रसूलल्लाह! क्या हुआ कि हुज़ूर ने वुज़ू का हुक्म फ़रमाया इरशाद फ़रमाया वह तहबन्द लटकाये नमाज़ पढ़ रहा था और बेशक अल्लाह तआला उस शख़्स की नमाज़ नहीं क़़बूल फ़रमाता जो तहबन्द लटकाये हुये हो यानि इतना नीचा की पाँव के गट्टे छुप जायें)

(अबू दाऊद)

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