नमाज़ दोहराना कब ज़रूरी (मकरूह-ए-तहरीमी )

नमाज़ दोहराना कब ज़रूरी (मकरूह-ए-तहरीमी )

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1986

بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

  • कपड़े या दाढ़ी या बदन के साथ खेलना, कपड़ा समेटना जैसे सजदे में जाते वक़्त आगे या पीछे से उठा लेना चाहे धूल से बचाने के लिये किया हो मकरूह-ए-तहरीमी हैं और बिला वजह हो तो और ज़्यादा मकरूह।
  • कपड़ा लटकाना जैसे कंधों पर इस तरह डालना कि दोनों किनारे लटकते हों मकरूह-ए-तहरीमी हैं। अगर कुर्ते वग़ैरा की आस्तीन में हाथ न डाले बल्कि पीठ की तरफ़ फेंक दी जब भी यही हुक्म है।
  • रुमाल, शाल, रज़ाई या चादर के किनारे दोनों कंधों से लटकते हों यह मकरूह-ए-तहरीमी है और एक किनारा दूसरे कंधे पर डाल दिया और दूसरा लटक रहा है तो हर्ज नहीं और अगर एक ही कंधे पर डाला इस तरह कि एक किनारा पीठ पर लटक रहा है दूसरा पेट पर जैसे आमतौर पर कंधों पर रुमाल रखने का तरीक़ा है तो यह भी मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • आस्तीन आधी कलाई से ज़्यादा चढ़ी हुई या दामन समेटे नमाज़ पढ़ना भी मकरूह-ए-तहरीमी है चाहे वह पहले से चढ़ी हो या नमाज़ में चढ़ाई हो।
  • जब पाख़ाना-पेशाब को जाने की बहुत ज़रूरत हो या “रीह” (गैस) की परेशानी हो उस वक़्त नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी है। हदीस में है कि जब नमाज़ क़ायम की जाए और किसी को बैतुलख़ला (Toilet) जाना हो तो पहले बैतुलख़ला को जाए।
  • नमाज़ शुरू करने से पहले अगर इन चीज़ों का ज़ोर हो तो वक़्त में गुँजाइश होते हुए शुरू करना ही मना और गुनाह है। ऐसी सूरत में ज़रूरी है कि पहले उससे फ़ारिग़ हो ले चाहे जमाअत जाती रहे और अगर वक़्त कम है कि फ़ारिग़ होने और वुज़ू करने के बाद वक़्त जाता रहेगा तो पहले नमाज़ पढ़ ले और अगर नमाज़ के बीच में यह हालत पैदा हो जाए और वक़्त में गुंजाइश हो तो तोड़ देना वाजिब अगर उसी तरह पढ़ ली तो गुनाहगार हुआ।
  • मर्दों को जूड़ा बांधकर नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी है, नमाज़ में जूड़ा बांधा तो फ़ासिद हो गई। नोट: औरत जूड़ा बाँध कर नमाज़ पढ़ सकती है।
  • सजदे की जगह से नमाज़ में कंकरियाँ हटाना मकरूह-ए-तहरीमी है। लेकिन अगर पूरे तौर पर सुन्नत के मुताबिक़ सजदा अदा न होता हो तो एक बार की इजाज़त है और बचना बेहतर और अगर बग़ैर हटाए वाजिब अदा न होता हो तो हटाना वाजिब है चाहे एक बार से ज़्यादा की ज़रूरत पड़े।
  • नमाज़ में उंगलियाँ चटकाना, उंगलियों की क़ैंची बांधना यानि एक हाथ की उंगलियाँ दूसरे हाथ की उंगलियों में डालना मकरूह-ए-तहरीमी है। नमाज़ के लिए जाते वक़्त और नमाज़ के इंतज़ार में भी यह दोनों चीज़ें मकरूह हैं।
  • कमर पर हाथ रखना मकरूह-ए-तहरीमी है नमाज़ के अलावा भी कमर पर हाथ रखना नहीं चाहिए।
  • इधर-उधर मुँह फेर कर देखना मकरूह-ए-तहरीमी है पूरा चेहरा हो या थोड़ा अगर मुँह न फेरे सिर्फ़ कनखियों से इधर उधर बिना ज़रूरत देखे तो मकरूह-ए-तनज़ीही है और कभी ज़रूरत के वक़्त किसी जाइज़ गरज़ के लिए हो तो बिल्कुल हर्ज नहीं।
  • आसमान की तरफ़ निगाह उठाना भी मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • तशह्हुद (अत्तहीय्यात) या सजदों के दरमियान में कुत्ते की तरह बैठना यानि घुटनों को सीने से मिलाकर दोनों हाथों को ज़मीन पर रख कर सुरीन (कूल्हों) पर बैठना मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • मर्द का सजदे में कलाईयों का बिछाना मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • किसी शख़्स के मुँह के सामने नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • दूसरे शख़्स को नमाज़ी की तरफ़ मुँह करना भी नाजाइज़ व गुनाह है यानि अगर नमाज़ी की तरफ़ से हो तो कराहत नमाज़ी पर है वरना उस पर।
  • कपड़े में इस तरह लिपट जाना कि हाथ भी बाहर न हो मकरूहे तहरीमी है।
  • इमामा यानि पगड़ी इस तरह बांधना कि बीच सिर पर न हो मकरूह-ए-तहरीमी है। नमाज़ के अलावा भी इस तरह इमामा बांधना मकरूह है।
  • नाक और मुँह को छिपाना मकरूह-ए-तहरीमी हैं।
  • बिना ज़रूरत खंकार निकालना भी मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • नमाज़ में जानबूझ कर जमाही लेना मकरूह-ए-तहरीमी है और ख़ुद आए तो हर्ज नहीं मगर रोकना मुस्तहब है अगर रोके से न रुके तो होंठ को दाँतों से दबाए और इस पर भी न रुके तो हाथ मुँह पर रख ले या आस्तीन से मुँह छिपा ले। क़ियाम में दाहिने हाथ से मुँह ढकें और दूसरे मौक़ों पर बायें से।

फ़ायदा: अंम्बियाگ जमाही से महफ़ूज़ हैं इसलिए कि इसमें शैतान का दख़्ल है। नबी-ए-करीमگने फ़रमाया कि जमाही शैतान की तरफ़ से है जब तुममें किसी को जमाही आए तो जहाँ तक मुमकिन हो रोके। इस हदीस को इमाम बुख़ारी व मुस्लिम ने सहीहैन में रिवायत किया बल्कि बाज़ रिवायतों में है कि शैतान मुँह में घुस जाता है। बाज़ में है शैतान देख कर हँसता है। इसके रोकने की बेहतर तरकीब यह है कि जब आती मालूम हो तो दिल में ख़्याल करे कि अंम्बियाگ इससे महफ़ूज़ हैं फ़ौरन रुक जायेगी।

कपड़ों या दीवारों वग़ैरा पर तस्वीर हो तो नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी है।

  • जिस कपड़े पर जानदार की तस्वीर हो उसे पहनकर नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी है। नमाज़ के अलावा भी ऐसा कपड़ा पहनना नाजाइज़ है। आमतौर पर बच्चों के कपड़ों में माँ-बाप इसका लिहाज़ नहीं रखते इस पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है क्योंकि जब बचपन से इसका लिहाज़ रखा जायेगा तो बड़े होकर बच्चों को भी इसका ध्यान रहेगा।
  • किसी कमरे वग़ैरा में जहाँ नमाज़ पढ़ रहे हों वहाँ पर छत में, दीवारों पर जानदार की तस्वीर लगी हुई या लटकी हुई हो या फ़र्श पर सजदों की जगह में पड़ी या बनी हुई हो तो नमाज़ मकरूह-ए-तहरीमी होगी।
  • नमाज़ी के आगे-पीछे या दाहिने या बायें तरफ़ जानदार की तस्वीर का होना चाहे दीवार में बनी हो, लटकी हुई हो या अलमारी (show case) में रखी हो मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • अगर ऐसी तस्वीर हो जिसमें सिर और चेहरा न हो या जिसका चेहरा मिटा दिया हो जैसे कागज़, कपड़े या दीवार पर हो तो उस पर रौशनाई (Ink) फेर दी हो या उसके सिर और चेहरे को खुरच डाला या धो डाला हो तो कराहत नहीं।
  • ऊपर दिये गये अहकाम तो नमाज़ के हैं कि तस्वीर की वजह से नमाज़ें बर्बाद हो जाती हैं लेकिन तस्वीर के रखने के बारे में सही हदीस में इरशाद हुआ कि जिस घर में कुत्ता हो या तस्वीर हो उसमें रहमत के फ़रिश्ते नहीं आते। आज हम मुसलमानों के घर जो अल्लाह की रहमत से महरूम हैं उसकी एक बहुत बड़ी वजह यह भी है कि घरों में तस्वीरें लगाना आम हो गया है।
  • तस्वीर बनाना या बनवाना भी हराम है। चाहे हाथ की बनी हो, या कैमरे से खींची दोनों का एक हुक्म है।
  • उल्टा क़ुरआन मजीद पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • किसी वाजिब को तर्क करना मकरूह-ए-तहरीमी है जैसे रुकू व सुजूद में पीठ सीधी न करना इसी तरह क़ौमा और जलसा में सीधे होने से पहले सजदे को चले जाना।
  • क़ियाम के अलावा और किसी मौक़े पर क़ुरआन मजीद पढ़ना या रुकू में क़िरात ख़त्म करना मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • इमाम से पहले मुक़तदी का रुकू व सुजूद वग़ैरा में जाना या उससे पहले सिर उठाना मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • सिर्फ़ पाजामा या तहबन्द पहनकर नमाज़ पढ़ी और कुर्ता या चादर मौजूद है तो नमाज़ मकरूह-ए-तहरीमी है और जो दूसरा कपड़ा नहीं तो माफ़ी है।
  • इमाम को किसी आने वाले की ख़ातिर नमाज़ को बढ़ाना मकरूह-ए-तहरीमी है। अगर उसको पहचानता हो और उसका लिहाज़ दिल में हो और अगर नमाज़ पर उस की मदद के लिए एक दो तस्बीह के मिक़दार बढ़ा दिया तो कराहत नहीं।
  • जल्दी में सफ़ के पीछे ही से अल्लाहु अकबर कहकर जमाअत में शामिल हो गया फिर सफ़ में दाख़िल हुआ यह मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • ग़सब की हुई ‌यानि नाजाइज़ क़ब्ज़ा की हुई ज़मीन में या किसी दूसरे के खेत में जिसमें खेती मौजूद है या जुते हुए खेत में नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी है
  • क़ब्र का सामने नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी है जबकि नमाज़ी व क़ब्र के दरमियान कोई आढ़ न हो।
  • ग़ैर मुस्लिमों के इबादतख़ानों में नमाज़ पढ़ना मकरूह है कि वह शैतानों की जगह हैं और ज़ाहिर मकरूह-ए-तहरीमी। बल्कि उनमें जाना भी मना है।
  • उल्टा कपड़ा पहन कर या ओढ़ कर नमाज़ पढ़ना मकरूह है और ज़ाहिर यह है कि मकरूह-ए-तहरीमी है।
  • अंगरखे के बंद न बांधना और अचकन (शेरवानी) वग़ैरा के बटन न लगाना अगर उसके नीचे कुर्ता वग़ैरा नहीं और सीना खुला रहा तो ज़ाहिर कराहते तहरीम है और नीचे कुर्ता वग़ैरा है तो मकरूह-ए-तनज़ीही।

नोटः- यहाँ तक तो वह मकरूहात बयान हुए जिनका मकरूह-ए-तहरीमी होना उन बड़ी-बड़ी किताबों में ज़िक्र है जिनको हनफ़ी उलमा ने सही माना है।

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