नमाज़ कब फ़र्ज़ होती है?

नमाज़ कब फ़र्ज़ होती है?

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

  • हर मुसलमान जो आक़िल यानि समझदार और बालिग़ हो उस पर नमाज़ फ़र्ज़ है।
  • जो शख़्स नमाज़ के फ़र्ज़ होने का इन्कार करे वह काफ़िर है।
  • जो शख़्स जानबूझ कर नमाज़ छोड़े चाहे एक ही वक़्त की, वह फ़ासिक़ है।
  • जो नमाज़ न पढ़ता हो उसे क़ैद करने का हुक्म है, यहाँ तक कि तौबा करे और नमाज़ पढ़ने लगे।
  • बच्चे को सात साल की उम्र से नमाज़ पढ़ना सिखाया जाए और दस साल का होने के बाद अगर न पढ़े तो मार कर पढ़ायें।
  • नमाज़ जिस पर फ़र्ज़ है उसी को पढ़ना ज़रूरी है उसकी तरफ़ से कोई दूसरा नहीं पढ़ सकता। न ही उसकी ज़िन्दगी में नमाज़ के बदले कुछ माल फ़िदया के तौर पर दिया जा सकता है। लेकिन अगर कुछ नमाज़ें रह गईं और इन्तक़ाल हो गया तो उसकी बची हुई नमाज़ों का फ़िदया अदा करना ज़रूरी है। एक नमाज़ का फ़िदया किसी ज़रुरतमन्द बालिग़ शख़्स को दो वक़्त का खाना खिलाना या उसके बराबर रक़म देना है।
  • नमाज़ के फ़र्ज़ होने की हक़ीक़ी वजह अल्लाह का हुक्म है और ज़ाहिरी वजह वक़्त है यानि किसी नमाज़ का मुक़र्ररा वक़्त शुरू होते ही नमाज़ फ़र्ज़ हो जायेगी। उस नमाज़ को आख़िर वक़्त तक जब भी अदा करे अदा हो जायेगी और फ़र्ज़ उसके ज़िम्मे से ख़त्म हो जायेगा।
  • यहाँ यह ध्यान देना ज़रूरी है कि अगर किसी शख़्स पर मुसलमान होने या बालिग़ होने या पाक होने या होश में आने की वजह से नमाज़ फ़र्ज़ हुई और नमाज़ का सिर्फ़ इतना वक़्त बाक़ी है कि “अल्लाहु अकबर” कह सके तो उस पर उस वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ हो जाती है और वह नमाज़ क़ज़ा पढ़ी जायेगी।
  • कोई नाबालिग़ लड़का इशा की नमाज़ पढ़कर सोया और बालिग़ होने का आसार ज़ाहिर हो गया यानि उसको इहतिलाम (स्वपन दोष) हो गया, तो अगर फ़ज्र का वक़्त शुरू होने के बाद आँख खुली तो नमाज़ दुबारा पढ़ना ज़रूरी है और अगर फ़ज्र का वक़्त शुरू होने से पहले आँख खुल गई तो उस पर इशा की नमाज़ हर मसलक के मुताबिक़ फ़र्ज़ है।

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