नमाज़ में इनसे बचना ज़रूरी (मकरूह-ए-तनज़ीही)

नमाज़ में इनसे बचना ज़रूरी (मकरूह-ए-तनज़ीही)

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

यहाँ पर वह अमल बयान किये  गये हैं जिनमें अक्सर का मकरूह-ए-तन्ज़ीही होना साफ़-साफ़ लिखा है और बाज़ में इख़्तिलाफ़ है मगर सही यही है कि मकरूह-ए- तनज़ीही है।

  • सजदे या रुकू में बिना ज़रूरत तीन तस्बीह से कम कहना हदीस में इसी को मुर्ग़े की सी ठोंग मारना फ़रमाया, लेकिन वक़्त कम हो या रेल/बस चले जाने के ख़ौफ़ से हो तो हर्ज नहीं और अगर मुक़तदी तीन तस्बीह न कहने पाया था कि इमाम ने सिर उठा लिया तो इमाम का साथ दे।
  • काम-काज के कपड़ों से नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तनज़ीही है जबकि उसके पास और कपड़े हों वरना कराहत नहीं।
  • मुँह में कोई चीज़ लिए हुए नमाज़ पढ़ना पढ़ाना मकरूह है जबकि क़िरात करने में फ़र्क़ न पढ़ता हो। अगर क़िरात को रोकता हो जैसे आवाज़ ही न निकले या इस क़िस्म के अल्फ़ाज़ निकलें कि क़ुरआन के न हों तो नमाज़ फ़ासिद हो जाएगी।
  • सुस्ती से, बोझ समझकर या गर्मी की वजह से नंगे सिर नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तनज़ीही है। अगर नमाज़ की तौहीन का इरादा है जैसे यह समझता है कि नमाज़ कोई शान की चीज़ नहीं जिसके लिए टोपी, इमामा पहना जाए तो यह कुफ़्र है।
  • नमाज़ में टोपी गिर पड़ी तो उठा लेना अफ़ज़ल है जबकि अमले कसीर न हो वरना नमाज़ फ़ासिद हो जाएगी और बार-बार उठानी पड़े तो छोड़ दे और न उठाने से ख़ुज़ू मक़सूद हो तो न उठाना अफ़ज़ल है।
  • माथे पर सजदा करते में मिट्टी या घास लग गई उसे छुड़ाना मकरूह है जबकि इनकी वजह से नमाज़ में परेशानी न हो यानि ख़्याल न बटे और तकब्बुर की वजह से छुड़ाना मकरूह-ए-तहरीमी है और अगर तकलीफ़ देने वाली हों या ख़्याल बटता हो तो छुड़ाने में हर्ज नहीं। और नमाज़ के बाद छुड़ाने में तो बिल्कुल हर्ज नहीं बल्कि छुड़ा लेना चाहिए ताकि रिया (दिखावा) न आने पाए।
  • ज़रूरत के वक़्त माथे से पसीना पोंछना बल्कि हर वह अमल-ए-क़लील जो नमाज़ी के लिए फ़ायदेमन्द हो जाइज़ है और जो फ़ायदेमन्द न हो मकरूह है।
  • नमाज़ में नाक से पानी बहा उसको पोंछ लेना ज़मीन पर गिरने से बेहतर है और अगर मस्जिद में है तो ज़रूर दामन वग़ैरा से पोंछ लेना चाहिए।
  • नमाज़ में उंगलियों पर आयतों और सूरतों और तस्बीहात का गिनना मकरूह है नमाज़ फ़र्ज़ हो चाहे नफ़्ल और दिल में गिनती रखना या पोरों को दबाने से गिनती याद रखना और सब उंगलियाँ सुन्नत तरीक़े पर अपनी जगह पर हों इसमें कुछ हर्ज नहीं मगर ख़िलाफ़े औला है कि दिल दूसरी तरफ़ बटेगा और ज़ुबान से गिनने से नमाज़ फ़ासिद हो जाती है।
  • हाथ या सिर के इशारे से सलाम का जवाब देना मकरूह है।
  • नमाज़ में बिना किसी शरई मजबूरी के चार ज़ानू (पालथी मार कर) बैठना मकरूह है और शरई मजबूरी हो तो हर्ज नहीं।
  • नमाज़ में दामन या आस्तीन से अपने को हवा करना मकरूह है जबकि दो एक बार हो। अगर एक रुक्न में तीन बार हरकत दे दी तो नमाज़ फ़ासिद हो जाती है।
  • अगंड़ाई लेना और जानबूझ कर खांसना, खंकारना या थूकना मकरूह है।
  •  सफ़ में जहाँ जमाअत में शामिल लोग खड़े हों अकेले नमाज़ पढ़ने वाला को खड़ा होना मकरूह है। मुक़तदी को सफ़ के पीछे अकेले खड़ा होना मकरूह है जबकि सफ़ में जगह मौजूद हो और अगर सफ़ में जगह न हो तो हर्ज नहीं।
  • फ़र्ज़ की एक रकअत में किसी आयत को बार बार पढ़ना जबकि और दूसरी आयतें याद हों मकरूह है और शरई मजबूरी से हो तो हर्ज नहीं। किसी एक सूरह को बार बार पढ़ना भी मकरूह है।
  • सजदे को जाते वक़्त घुटने से पहले हाथ रखना और उठते वक़्त हाथ से पहले घुटने उठाना बिना शरई मजबूरी मकरूह है।
  • रुकू में सिर को पीठ से ऊँचा या नीचा करना मकरूह है।
  •  “बिस्मिल्लाह“, “अऊज़ुबिल्लाह“, सना और आमीन ज़ोर से कहना या रुकू और सुजूद की तस्बिहात को उनकी जगह से हटाकर पढ़ना मकरूह है।
  • बग़ैर शरई मजबूरी दीवार या छड़ी पर टेक लगाना मकरूह है और शरई मजबूरी से हो तो हर्ज नहीं बल्कि फ़र्ज़ व वाजिब व सुन्नते फ़ज्र के क़ियाम में उस पर टेक लगा कर खड़ा होना फ़र्ज़ है जबकि बग़ैर उसके क़ियाम न हो सके। जैसा कि क़ियाम के बयान में ज़िक्र हुआ।
  • रुकू में घुटनों पर और सजदों में ज़मीन पर हाथ न रखना मकरूह है।
  • आस्तीन को बिछा कर सजदा करना ताकि चेहरे पर ख़ाक न लगे मकरूह है और तकब्बुर की वजह से हो तो कराहते तहरीम और गर्मी से बचने के लिए कपड़े पर सजदा किया तो हर्ज नहीं।
  • दाहिने या बायें झूमना मकरूह है और कभी एक पाँव पर ज़ोर दिया कभी दूसरे पर यह सुन्नत है।
  • उठते वक़्त आगे पीछे पाँव उठाना मकरूह है और सजदे को जाते वक़्त दाहिनी तरफ़ ज़ोर देना और उठते वक़्त बायें पैर पर ज़ोर देना मुस्तहब है।
  • नमाज़ में आंखें बन्द रखना मकरूह है मगर जब खुली रहने में ख़ुशू न होता हो तो बंद करने में हर्ज नहीं बल्कि बेहतर है।
  • सजदा वग़ैरा में क़िबले से उंगलियों को फेर देना मकरूह है।
  • मस्जिद में कोई जगह अपने लिए ख़ास कर लेना कि वहीं नमाज़ पढ़े यह मकरूह है।
  • जलती आग नमाज़ी के आगे होना मकरूह है, शमा या चिराग़ में कराहत नहीं।
  • सामने पाख़ाना वग़ैरा निजासत होना या ऐसी जगह नमाज़ पढ़ना जहाँ निजासत होने का शक हो तो नमाज़ मकरूह है।
  • सजदे में रान को पेट से चिपका देना या हाथ से बगै़र शरई मजबूरी मक्खी, मच्छर उड़ाना मकरूह है। मगर औरत सजदे में रान पेट से मिलायें।
  • ऐसी चीज़ जो दिल को अपनी तरफ़ खींचे, उसके सामने नमाज़ मकरूह है जैसे कोई ख़ूबसूरत चीज़ या खेल कूद वग़ैरा।
  • नमाज़ के लिए दौड़ना मकरूह है।
  • एक ज़मीन मुसलमान की हो दूसरी काफ़िर की तो मुसलमान की ज़मीन पर नमाज़ पढ़े अगर खेती न हो वरना रास्ते पर पढ़े काफ़िर की ज़मीन पर न पढ़े और अगर ज़मीन में खेती है मगर इसमें और मालिके ज़मीन में दोस्ती है कि उसे नागवार न होगा तो पढ़ सकता है।

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