क़ज़ा नमाज़ का बयान

क़ज़ा नमाज़ का बयान

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

• बिना शरई मजबूरी के नमाज़ क़ज़ा करना बहुत सख़्त गुनाह है , उस पर फ़र्ज़ है कि उसकी क़ज़ा पढ़े और सच्चे दिल से तौबा करे। तौबा से नमाज़ को देर से पढ़ने का गुनाह माफ़ हो जाएगा।
• तौबा जब ही सही है कि क़ज़ा पढ़ ले।
• दुश्मन का ख़ौफ़ नमाज़ क़ज़ा कर देने के लिए उज़्र है।
• मुसाफ़िर को चोर और डाकुओं का सही अंदेशा है तो इसकी वजह से वक़्ती नमाज़ क़ज़ा कर सकता है बशर्ते कि किसी तरह नमाज़ पढ़ने पर क़ादिर न हो और अगर सवार है और सवारी पर पढ़ सकता है अगर्चे चलने ही की हालत में या बैठ कर पढ़ सकता है तो उज़्र न हुआ।
• जिस चीज़ का बन्दों पर हुक्म है उसे वक़्त पर करने को “अदा” कहते हैं और वक़्त के बाद में करने को “क़ज़ा” । अगर उस हुक्म के करने में कोई ख़राबी पैदा हो जाए तो वह ख़राबी दूर करने के लिए दोबारा पढ़ने को “इआदा” कहते है।
• वक़्त में अगर तकबीरे-तहरीमा कहकर नीयत बांध ली नमाज़ क़ज़ा न हुई बल्कि अदा है। मगर फ़ज्र व जुमा व ईदैन की नमाज़ें नहीं होंगी क्योंकि इनमें सलाम से पहले भी अगर वक़्त निकल गया तो नमाज़ नहीं होती ।
• सोते में या भूल से नमाज़ क़ज़ा हो गई तो उसकी क़ज़ा पढ़नी फ़र्ज़ है अलबत्ता क़ज़ा का गुनाह उस पर नहीं मगर जागने पर और याद आने पर अगर वक़्त मकरूह नहीं है तो उसी वक़्त पढ़ ले देर करना मकरूह है। मगर वक़्त शुरू होने के बाद सो गया फिर वक़्त निकल गया तो गुनाहगार हुआ जबकि जागने का भरोसा न हो या जगाने वाला मौजूद न हो बल्कि फ़ज्र में वक़्त से पहले भी सोने की इजाज़त नहीं हो सकती जबकि अक्सर हिस्सा रात का जागने में गुज़रा और ग़ालिब गुमान है कि अब सो गया तो वक़्त में आँख न खुलेगी तो भी सोने की इजाज़त नहीं।
• कोई सो रहा है या नमाज़ पढ़ना भूल गया तो जिसे मालूम हो उस पर वाजिब है कि सोते को जगा दे और भूले हुए को याद दिला दे।
• जब यह अंदेशा हो कि सुबह नमाज़ के वक़्त आँख नहीं खुलेगी तो बिना शरई ज़रूरत के उसे रात देर तक जागना मना है।
• क़ज़ा के लिए कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं। उम्र में जब पढ़ेगा उसका फ़र्ज़ पूरा हो जायेगा।
• सूरज के निकलने, डूबने और ज़वाल के वक़्त नमाज़ जाइज़ नहीं। यानि इन तीन वक़्तों के अलावा उम्र में किसी भी नमाज़ की क़ज़ा किसी भी वक़्त में पढ़ सकता है
• पागलपन की हालत जो नमाज़े रह गईं , ठीक होने के बाद उनकी क़ज़ा वाजिब नहीं जबकि जुनून छः वक़्त की नमाज़ों के बराबर रहा हो।
• दारुलहरब (वह मुल्क जहाँ काफ़िरों की हुकूमत हो और इस्लामी क़ानून मानने पर रोक हो) में कोई शख़्स मुसलमान हुआ और अहकामे शरीयत यानि नमाज़, रोज़ा, ज़कात वग़ैरा उस तक नहीं पहुँचे तो जब तक वहाँ रहा उन दिनों की क़ज़ा उस पर वाजिब नहीं और जब दारुल इस्लाम में आ गया तो अब जो नमाज़ क़ज़ा होगी उसे पढ़ना फ़र्ज़ है कि दारुल इस्लाम में अहकाम का न जानना उज़्र नहीं।
• ऐसा मरीज़ जो इशारे से भी नमाज़ नहीं पढ़ सकता और यह हालत पूरे छः वक़्त तक रही तो इस हालत में जो नमाज़ें छूटीं उनकी क़ज़ा वाजिब नहीं।
• जो नमाज़ जैसी फ़ौत हुई उसकी क़ज़ा वैसी ही पढ़ी जायेगी जैसे सफ़र में नमाज़ क़ज़ा हुई तो चार रकअत वाली दो ही पढ़ी जायेंगी।
• किसी शख़्स की छः से कम नमाज़ें क़ज़ा हों तो वह साहिब-ए-तरतीब कहलाता है, उसके लिये ज़रूरी है कि किसी वक़्त की अदा नमाज़ पढ़ने से पहले क़जा नमाज़ पढ़े नहीं तो उस वक़्त की जो अदा नमाज़ पढ़ी है वह नहीं होगी।
• क़ज़ा पढ़ने में पाँचों वक़्त के फ़र्ज़ों में आपस में और फ़र्ज़ व वित्र में तरतीब ज़रूरी है कि पहले फ़ज्र, फिर ज़ुहर, फिर अस्र, फिर मग़रिब, फिर इशा, फिर वित्र पढ़े चाहे यह सब क़ज़ा हों या कुछ अदा कुछ क़ज़ा मसलन ज़ुहर की क़ज़ा हो गई तो फ़र्ज़ है कि इसे पढ़कर अस्र पढ़े या वित्र क़ज़ा हो गया तो उसे पढ़ कर फ़ज्र पढ़े अगर याद होते हुए अस्र या फ़ज्र की पढ़ ली तो नाजाइज़ है।
• जुमे के दिन फ़ज्र की नमाज़ क़ज़ा हो गई अगर फ़ज्र पढ़कर जुमे में शरीक हो सकता है तो फ़र्ज़ है कि पहले फ़ज्र पढ़े अगर्चे ख़ुतबा होता हो और अगर जुमा न मिलेगा मगर ज़ुहर का वक़्त बाक़ी रहेगा जब भी फ़ज्र पढ़ कर ज़ुहर पढ़े और अगर ऐसा है कि फ़ज्र पढ़ने में जुमा भी जाता रहेगा और जुमे के साथ वक़्त भी ख़त्म हो जायेगा तो जुमा पढ़ ले फिर फ़ज्र पढ़े इस सूरत में तरतीब साक़ित है यानि अब तरतीब की ज़रूरत नहीं।
• क़ज़ा नमाज़ याद नहीं रही और जिस नमाज़ का वक़्त था पढ़ ली, पढ़ने के बाद क़ज़ा नमाज़ याद आई तो उस वक़्त की नमाज़ हो गई और पढ़ने के दौरान याद आई तो उस वक़्त की नमाज़ भी नहीं हुई।
• फ़ज्र की नमाज़ क़ज़ा हो गई और याद होते हुए ज़ुहर की पढ़ ली फिर फ़ज्र की पढ़ ली तो ज़ुहर की न हुई। अस्र पढ़ते वक़्त ज़ुहर की याद थी मगर अपने गुमान में ज़ुहर को जाइज़ समझा था तो अस्र की हो गई। ग़र्ज़ यह है कि फ़र्ज़ियत की तरतीब से जो नहीं जानता है उसका हुक्म भूलने वाले की तरह है कि उसकी नमाज़ हो जायेगी।
• छः नमाज़ें अगर क़ज़ा हो गईं यानि छटी का वक़्त ख़त्म हो गया तो अब उस पर तरतीब फ़र्ज़ नहीं। अब चाहे इसके बावुजूद कि वक़्त की गुंजाइश हो और क़ज़ा याद भी हो उस वक़्त की अदा नमाज़ पढ़ेगा तो हो जाएगी, चाहे वह सब एक साथ क़ज़ा हुईं हों या अलग-अलग दिनों या वक़्तों में।
• जब छः नमाज़ें क़ज़ा होने के सबब तरतीब टूट गई तो इनमें से अगर कुछ पढ़ लीं कि छः से कम रह गईं तो वह तरतीब का हुक्म अभी नहीं होगा जब तक सब क़ज़ा न पढ़ ले और सब पढ़ लीं अब फिर साहिबे तरतीब हो गया और अब जो कोई नमाज़ क़ज़ा होगी तो उन्हीं पहले वाली शर्तों के साथ उसे पढ़कर वक़्ती नमाज़ पढ़े वरना नहीं होगी।
• भूलने या वक़्त की कमी की वजह से तरतीब टूट गई तो अब तरतीब का हुक्म फिर नहीं होगा मसलन भूल कर नमाज़ पढ़ ली अब याद आया तो नमाज़ का लौटाना नहीं अगर्चे वक़्त में बहुत कुछ गुंजाइश हो।
• औरत की एक नमाज़ क़ज़ा हुई उसके बाद हैज़ आ गया तो हैज़ से पाक होकर पहले क़ज़ा पढ़ ले फिर वक़्ती नमाज़ पढ़े अगर क़ज़ा याद होते हुए वक़्ती पढ़ेगी न होगी जबकि वक़्त में गुन्जाइश हो।
• जिसके ज़िम्मे क़ज़ा नमाज़ें हों हालांकि उनका पढ़ना जल्द से जल्द वाजिब है मगर बाल बच्चों की परवरिश वग़ैरा और ज़रूरी काम-काज की वजह से देर जाइज़ है तो कारोबार भी करे और जो वक़्त फ़ुर्सत का मिले उसमें क़ज़ा पढ़ता रहे यहाँ तक कि पूरी हो जायें।
• क़ज़ा नमाज़ें नफ़्ल से अहम हैं यानि जिस वक़्त नफ़्ल पढ़ता है उन्हें छोड़ कर उनके बदले कज़ा नमाज़ें पढ़े कि फ़र्ज़ ज़िम्मे से निकल जायें अलबत्ता तरावीह और बारह रकअतें सुन्नते मौअक्कदा की न छोड़े।
• किसी शख़्स की एक नमाज़ क़ज़ा हो गई और यह याद नहीं कि कौन सी नमाज़ थी तो एक दिन की सब नमाज़ें पढ़े। इसी तरह अगर दो नमाज़ें दो दिन में क़ज़ा हुईं तो दोनों दिनों की सब नमाज़ें पढ़े।
• जिसकी नमाज़ें क़ज़ा हो गईं और इन्तिक़ाल हो गया तो अगर वसीयत कर गया है और माल भी छोड़ा है तो उसकी तिहाई से हर फ़र्ज़ व वित्र के बदले फिदया अदा करें जोकि 2 किलो 45 ग्राम गेहूँ या उसकी क़ीमत के बराबर रक़म है।
• मरने वाले की छूटी हुई फ़र्ज़ नमाज़ के बदले उसका वली नमाज़ पढ़े तो यह नाकाफ़ी है। इसी तरह अगर मर्ज़ की हालत में नमाज़ का फ़िदया दिया तो अदा न हुआ।
क़ज़ा-ए-उम्री और उसका आसान तरीक़ा
उन लोगों के लिए जिनकी तमाम उम्र में कई बरस की नमाज़ें क़ज़ा हुईं और अब अल्लाह तआला ने उन्हें तौफ़ीक़ दी कि अदा करें तो उनके लिए क़ज़ा-ए-उम्री का आसान तरीक़ा यह है
इन नमाज़ों को सूरज निकलते या डूबते वक़्त और ज़वाल के वक़्त के अलावा हर वक़्त अदा कर सकता है। वह चाहे तो पहले एक वक़्त की जैसे फ़ज्र की सब नमाज़ें अदा कर ले, फिर ज़ुहर, फिर अस्र, फिर मग़रिब, फिर इशा की या सब नमाज़ें साथ अदा करता जाये और उनका ऐसा हिसाब लगाये कि हिसाब में कोई नमाज़ बाक़ी न रह जाये बल्कि ज़्यादा हो जायें तो हर्ज नहीं और वह सब अपनी ताक़त के मुताबिक़ जितनी जल्दी हो सके अदा कर ले काहिली न करे कि जब तक फ़र्ज़ ज़िम्मे बाक़ी रहता है कोई नफ़्ल क़बूल नहीं किया जाता।
नीयत इन तमाम नमाज़ों की इस तरह हो मसलन सौ बार की फ़ज्र क़ज़ा है तो हर बार यूँ कहे कि सब से पहले जो फ़ज्र मुझ से क़ज़ा हुई, हर दफ़ा यही कहे यानि जब एक अदा हुई तो बाक़ियों में जो सब से पहले है। इसी तरह ज़ुहर वग़ैरा हर नमाज़ में नीयत करे।
जिस पर बहुत सी नमाज़ें क़ज़ा हों उसके लिए जल्दी अदा करने का तरीक़ा यह है कि
• फ़र्ज़ की तीसरी और चौथी रकअत में बजाय सूरह फ़ातिहा के तीन बार ‘सुब्ह़ानल्लाह’ कहे अगर एक बार भी कह लेगा तो फ़र्ज़ अदा हो जायेगा।
• रुकू और सजदों की तस्बीह सिर्फ़ एक-एक बार पढ़ लें काफ़ी है। मगर रुकू या सजदे पूरी तरह जाने बाद तस्बीह पढ़ें और तस्बीह पूरी होने के बाद ही सिर उठायें। अगर यह एहतियात न की तो नमाज़ नहीं होगी।
• अत्तहीय्यात के बाद दोनों दुरूद शरीफ़ की जगह ‘‘अल्लाहुम्मा सल्लिअला सय्यिदिना मुहम्मदिवं व आलिही’’ और वित्रों में बजाय दुआ-ए-क़ुनूत के ‘रब्बिग़ फ़िरली’ कहना काफ़ी है।
तुलू-ए-आफ़ताब के बीस मिनट बाद और ग़ुरूबे आफ़ताब से बीस मिनट पहले नमाज़ अदा करें। हर वह शख़्स जिसके ज़िम्मे नमाज़ें बाक़ी हैं छुप कर पढ़े कि गुनाह का एलान जाइज़ नहीं।
अगर बालिग़ होने का वक़्त याद नहीं है तो उम्र का उस साल से हिसाब लगाये कि कम से कम कब बालिग़ होता। सफ़र की नमाज़ें क़स्र ही पढ़ी जायेंगीं। हिसाब लगा कर जल्द पढ़ें, कम न पढ़े अगर ज़्यादा हो जायें तो हर्ज नहीं, नफ़्ल में लग जायेंगी।

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