नफ़्ल रोज़े और उनके फ़ज़ाइल

नफ़्ल रोज़े और उनके फ़ज़ाइल

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

साल में कुछ ऐसे ख़ास दिन आते हैं जिनमे रोज़ा रखने की बहुत फ़ज़ीलत बयान की गई है इन्हें नफ़्ल रोज़े कहते हैं। यह रोज़े रखना फ़र्ज तो नहीं होता लेकिन इनके बहुत से फ़ज़ाइल हैं।

आशूरा यानि दस मुहर्रम का रोज़ा और नौ का भी बेहतर है।

  • रसूलुल्लाह گ फ़रमाते हैं रमज़ान के बाद अफ़ज़ल रोज़ा मुहर्रम का रोज़ा है और फ़र्ज़ के बाद अफ़ज़ल नमाज़ सलातुल्लैल यानि तहज्जुद की नमाज़ है।

(मुस्लिम व अबू दाऊद व तिर्मिज़ी व निसाई अबू हुरैराک से रिवायत)

  • रसूलुल्लाह گ जब मदीने में तशरीफ़ लाये यहूद को आशूरे के दिन रोज़ादार पाया। इरशाद फ़रमाया यह क्या दिन है कि तुम रोज़ा रखते हो। अर्ज़ की यह अज़मत वाला दिन है कि इसमें मूसा ے और उनकी क़ौम को अल्लाह तआला ने निजात दी और फ़िरऔन और उसकी क़ौम को डुबो दिया लिहाज़ा मूसा ے ने ब-तौरे शुक्र इस दिन का रोज़ा रखा तो हम भी रोज़ा रखते हैं, इरशाद फ़रमाया मूसा ے की मुआफ़िक़त करने में ब-निसबत तुम्हारे हम ज़्यादा हक़दार और ज़्यादा क़रीब हैं तो हुज़ूर گ ने ख़ुद भी रोज़ा रखा और इसका हुक्म भी फ़रमाया।

(सहीहैन में इब्ने अब्बास ک से मरवी)

अरफ़ा यानि नौ ज़िलहिज्जा का रोज़ा।

  • रसूलुल्लाह گ ने  अरफ़े के रोज़े को हज़ार दिन के बराबर बताया मगर हज करने वाले पर जो अराफ़ात में है उसे अरफ़े के दिन का रोज़ा रखना मकरूह है ।

(उम्मुल मोमिनीन सिद्दीक़ा रज़िअल्लाह अन्हा से बैहक़ी व तबरानी  रिवायत करते हैं)

  • हुज़ूर گ ने अरफ़े के दिन अराफ़ात में रोज़ा रखने से मना फ़रमाया।

(अबू दाऊद व निसाई व इब्ने ख़ुज़ैमा अबू हुरैराک से रावी)

शव्वाल में 6 दिन के रोज़े यानि शशईद के रोज़े

  • रसूलुल्लाह گ फ़रमाते हैं जिसने रमज़ान के रोज़े रखे फिर उनके बाद छः दिन शव्वाल में रखे तो ऐसा है जैसे दहर यानि साल भर का रोज़ा रखा ।

(मुस्लिम, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, निसाई, इब्ने माजा, तबरानी  में अबू अय्यूबک से रिवायत)

(और इसी के मिस्ल अबू हुरैरा  ؓ से मरवी)

  • रसूलुल्लाह گ फ़रमाते हैं जिसने रमज़ान के रोज़े रखे फिर उसके बाद छः दिन शव्वाल में रखे तो गुनाहों से ऐसे निकल गया जैसे माँ के पेट से पैदा हुआ है।

(तबरानी  औसत में अब्दुल्लाह इब्ने उमर ک से रावी)

शाबान का रोज़ा और पन्द्रहवीं शाबान के फ़ज़ाइल।

  • हुज़ूर گ ने फ़रमाया मेरे पास जिब्राईल आये और कहा यह शाबान की पन्द्रहवीं रात है इसमें अल्लाह तआला जहन्नुम से इतनों को आज़ाद फ़रमा देता है जितने बनी कल्ब  की बकरियों के बाल हैं मगर काफ़िर व अदावत वाले और रिश्ता काटने वाले और कपड़ा लटकाने वाले और वालिदैन की नाफ़रमानी करने वाले और हमेशा शराब पीने वाले की तरफ़ नज़रे रहमत नहीं फ़रमाता । (अरब में बनी कल्ब एक क़बीला है जिनके यहाँ बकरियाँ बहुत होती थीं)। इमाम अहमद ने इब्ने उमर کसे जो रिवायत की उसमें क़ातिल का भी ज़िक्र है।

(बैहक़ी ने उम्मुल मोमिनीन सिद्दीक़ा रज़िअल्लाह अन्हा से रिवायत)

  • नबी گ फ़रमाते हैं जब शाबान की पन्द्रहवीं रात आ जाती है तो उस रात को क़ियाम करो यानि पूरी नमाज़ और इबादत में गुज़ारो और दिन में रोज़ा रखो कि रब तबारक व तआला ग़ुरूबे आफ़ताब से आसमाने दुनिया पर ख़ास तजल्ली फ़रमाता है और फ़रमाता है कि है कोई बख़्शिश चाहने वाला कि उसे बख़्श दूँ , है कोई रोज़ी तलब करने वाला कि उसे रोज़ी दूँ , है कोई मुसीबत में मुब्तला कि उसे आफ़ियत दूँ, है कोई ऐसा! , है कोई ऐसा ! और यह उस वक़्त तक फ़रमाता है कि फ़ज्र यानि सुबह सादिक़ तुलू हो जाये।

(इब्ने माजा, हज़रत अलीک से रावी)

  • उम्मुल मोमिनीन सिद्दीक़ा रज़िअल्लाहु तआला अन्हा फ़रमाती हैं कि मैंने हुज़ूर अक़दस گको शाबान से ज़्यादा किसी महीने में रोज़ा रखते नहीं देखा।

 

हर महीने में तीन रोज़े ख़ास तौर पर 13, 14, 15 तारीख़ को जिन्हें “अय्यामे बैज़” कहते हैं।

  • रसूलुल्लाह گने फ़रमाया हर महीने में तीन दिन के रोज़े ऐसे हैं जैसे दहर (हमेशा) का रोज़ा ।

(सही बुख़ारी, मुस्लिम में अब्दुल्लाह इब्ने अम्र बिन आसک से मरवी)

 (इसी के मिस्ल क़ुर्रह इब्ने अयास ک से मरवी)

  • रसूलुल्लाह گने फ़रमाया जब महीने में तीन रोज़े रखने हों तो तेरह, चैदह, पन्द्रह को रखो।

(इमाम अहमद व तिर्मिज़ी व निसाई व इब्ने माजा अबू ज़र ک से रिवायत)

  • निसाई ने उम्मुल मोमिनीन हफ़सा रज़ीअल्लाह तआला अन्हा से रिवायत की कि हुज़ूर अक़दस گ चार चीज़ों को नहीं छोड़ते थे।
  1. आशूरा यानि दस मुहर्रम का रोज़ा,
  2. ज़िलहिज्जा यानि बक़रईद में पहली तारीख़ से नौ तारीख़ तक के रोज़े,
  3. हर महीने में तीन दिन के रोज़े और
  4. फ़ज्र के पहले दो रकअतें।

पीर और जुमेरात के रोज़े।

  • रसूलुल्लाह گफ़रमाते हैं पीर और जुमेरात को आमाल पेश होते हैं तो मैं पसन्द करता हूँ कि मेरा अमल उस वक़्त पेश हो कि मैं रोज़ादार हूँ ।

(सुनन-ए-तिर्मिज़ी में अबू हुरैराک से मरवी)

 (इसी के मिस्ल उसामा इब्ने जै़द व जाबिर ک से मरवी)

  • इब्ने माजा में उन्हीं से रावी है कि हुज़ूर گ पीर और जुमेरात को रोज़े रखा करते थे। इसके बारे में अर्ज़ की गई तो फ़रमाया इन दिनों में अल्लाह तआला हर मुसलमान की मग़फ़िरत फ़रमाता है मगर वह दो शख़्स जिन्होंने आपस में एक दूसरे से जुदाई कर ली है उनके बारे में मलाइका से फ़रमाता है इन्हें छोड़ो यहाँ तक कि यह  सुलह कर लें।
  • हुज़ूर گ से पीर के दिन रोज़े का सबब दरयाफ़्त किया गया। फ़रमाया इसी में मेरी विलादत (पैदाइश) हुई और इसी में मुझ पर “वह़ी” नाज़िल हुई।

(सही मुस्लिम शरीफ़ में अबू क़तादा ؓک से मरवी)

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